बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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७६ - लाँबी (अधीरता, अस्थिरता) दादरा
गुरुमुख पाइये रे, ऐसा ज्ञान विचार ।
समझ समझ समझ्या नहीं, लागा रँग अपार ॥टेक॥
जांण जांण जांण्या नहीं, ऐसी उपजै आइ ।
बूझ बूझ बूझ्या नहीं, ढोरी१ लागा जाइ ॥१॥
ले ले ले लीया नहीं, हौंस२ रही मन माँहिं ।
राख राख राख्या नहीं, मैं रस पीया नाँहिं ॥२॥
पाय पाय पाया नहीं, तेजैं तेज समाइ ।
कर कर कुछ कीया नहीं, आतम अँग लगाइ ॥३॥
खेल खेल खेल्या नहीं, सन्मुख सिरजनहार ।
देख देख देख्या नहीं, दादू सेवक सार ॥४॥
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परब्रह्म के अखँड साक्षात्कारार्थ सँत में अधैर्य रहता है, उसे प्रकट कर रहे हैं - अरे भाई ! गुरुजनों के मुख से ही ऐसा ज्ञान विचार सुनने में आता है कि - उस परब्रह्म का अपार प्रेम - रँग लग गया है, किन्तु शास्त्र सँतों द्वारा उसे बारँबार समझ कर भी उसका आदि, मध्य, अन्त नहीं समझ सके हैं । 
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उसे व्यापक तथा अपना स्वरूप जान कर भी बुद्धि में ऐसी भावना उत्पन्न होती रहती है कि अभी पूर्ण रूप से नहीं जाना गया । उसके विषय में बारँबार प्रश्न करके भी अभी तक न पूछने के समान भावना होती रहती है और सँत ब्रह्माकार वृत्ति द्वारा लगन१ पूर्वक उसकी ओर आगे बढ़ता रहता है । 
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मन, वचन, कर्म से उसकी प्राप्ति होने का निश्चय कर लेने पर भी नहीं प्राप्त करने की - सी स्थिति प्रतीत होती रहती है और प्राप्त करने की इच्छा२ मन में बनी रहती है । ध्यान द्वारा हृदय में और विचार द्वारा बुद्धि में रखने पर भी नहीं रखने के समान प्रतीत होता है । कारण, मैंने निदिध्यासन रूप अखँड रस का पान नहीं किया । 
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उसे व्यापक रूप से तथा आत्मा रूप से प्राप्त तो कर लिया किन्तु आत्म - प्रकाश, परमात्म - प्रकाश में लय होकर व्यवहार में भी उसकी भिन्न प्रतीति न हो, ऐसे नहीं प्राप्त कर सके । बारँबार योगादि साधन करके भी जब तक आत्मा को परमात्म स्वरूप में अभेद न कर सके, तब तक कुछ भी नहीं करने के समान भावना बनी रहती है ।
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ध्यानावस्था में और सविकल्प समाधि में परब्रह्म दर्शनानँद रूप खेल खेल कर भी जब तक ब्रह्म ज्ञान द्वारा ब्रह्म के सन्मुख होकर उनसे अभेद न हुआ, तब तक अखँडानन्द प्राप्ति रूप खेल न खेलने के समान ही भावना बनी रहती है । निर्विकल्पसमाधि में बारँबार साक्षात्कार करने पर भी नहीं देखने के समान देखने की इच्छा जिसमें बनी रहती है, वही सेवक श्रेष्ठ है ।
(क्रमशः)

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