#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= फुटकर काव्य १.चौबोला - ७.८ =*
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*केत कीन मैं बीनती केव राषि हौं चित्त ।*
*सेव तीनि बिधि करत हौं कुंज कली के मित्त ॥७॥*
मैंने आप से कितना निवेदन किया है । अब आप मेरे मन वाली बात कब करोगे ? अब मैं अपनी मित्रता सुरक्षित रखने के लिये तन मन धन से आपकी सेवा करूँगा ॥
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*रत नहिं दीसै तोर चित्त मो तीषो मन आहि ।*
*लालन यहु दुख बहुत है मानि कह्यौ मिलि चाहि ॥८॥*
मेरा मन तो आप में अतिशय अनुरक्त है । परन्तु आपका मन मुझमें वैसा अनुरक्त नहीं दिखायी दे रहा है । हे प्रिय ! आप मेरा कथन मान लीजिये तथा मैं जैसा चाहता हूँ वैसा ही कीजिये ॥(इस पद्य में मोती, लाल एवं रत्न – ये श्लिष्ट अर्थ निकलते हैं) ॥८॥
(क्रमशः)

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