मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग. ३३/३६


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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*कामधेनु घट घीव है, दिन दिन दुर्बल होइ ।*
*गौरू ज्ञान न ऊपजै, मथि नहिं खाया सोइ ॥३३॥*
जी दोहनविधि न जानने के कारण कामधेनु सर्वथा दुग्धप्रद होती हुई भी अपना दूध स्वयं पीने में असमर्थ होती है और पशु होने से प्रतिदिन आयु के क्षीण होने के कारण दुर्बल हो जाती है; उसी तरह जो पशुतुल्य हैं, जिन्होंने उपासना भी नहीं की अतएव पुण्यहीन भोगों में जिनका चित्त आसक्त है तथा स्वर्गादि सुखप्रद काम्य कर्मों में ही लगे रहते हैं ऐसे नराधम सर्वत्र आकाश की तरह व्यापक सर्वगत, अपने हृदय में स्थित ब्रह्म को नहीं पहचान पाते । इसीलिये वे जीते और मरते हैं बार-बार ॥३३॥
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*योगाभ्यास*
*साचा समर्थ गुरु मिल्या, तिन तत्त दिया बताइ ।*
*दादू मोटा महाबली, घट घृत मथि कर खाइ ॥३४॥*
मेरे गुरु सर्वसमर्थ हैं सब से महान् एवं बलवान् हैं । उन्होंने मेरे शुद्ध अन्तःकरण में ज्ञान का दीपक जला दिया । उसी के प्रकाश में मैं योगाभ्यास करता हुआ ब्रह्मानन्द का निरन्तर रसपान करता हूँ ।
लिखा है- वैराग्यरूपी तैल से पूर्ण तथा भक्ति रूपी बत्ती वाले प्रबोधपूर्ण पात्र में चैतन्यरूपी दीपक जला दिया ॥३४॥
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*मथि करि दीपक कीजिये, सब घट भया प्रकाश ।*
*दादू दीवा हाथि करि, गया निरंजन पास ॥३५॥*
ध्यानरुपी मन्थन से समाधि में स्थित होने के कारण मैंने ज्ञानदीपक जला दिया उसी ज्ञानदीपक को अन्तःकरण रूपी हाथ में रखकर मैंने उसी ज्ञान से ब्रह्मपद प्राप्त कर लिया ।
लिखा है कि- “दोनों भृकुटियों के मध्य आँखें मूँद कर निरन्तर जलते हुए दीपक के समान आकार वाली ब्रह्मज्योति का ध्यान करो ॥३५॥
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*परमार्थी*
*दीवै दीवा कीजिये, गुरुमुख मार्ग जाइ ।*
*दादू अपने पीव का, दर्शन देखै आइ ॥३६॥*
गुरुपदेशानुसार शिष्य यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार ध्यान धारणादि योगनिर्दिष्ट मार्ग से ध्यानस्थ स्व-चित्त को अविच्छिन्न तैल धारा की तरह स्थित करके अपने हृत्कमल में स्थित तेजोमय शुद्ध स्फटिक मणि के तुल्य निष्कल शुद्धस्वरूप भगवान् का सुस्थिर होकर चिन्तन करे ॥३६॥
(क्रमशः)

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