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*दादू निबहै त्यौं चलै, धीरै धीरज मांहि ।*
*परसेगा पीव एक दिन, दादू थाके नांहि ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उनमानी का अंग ८७*
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रज्जब रद्द१ न कीजिये, जो कुछ रजमा२ होय ।
इक सांई अरू संत जन, बुरा न मानै दोय ॥९॥
अपने में जो भी साधन करने का बल२ है, उसे निकम्मा१ मत समझो, उसके अनुसार ही भगवान प्राप्ति का साधन करो, कमी रहने पर संत और प्रभु दोनों ही बुरा नहीं मानते हैं ।
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कौन भाँति साहिब खुशी, सो जीव न जाने ।
पै रज्जब कीजे बंदगी१, अपने उनमाने२ ॥१०॥
प्रभु किस प्रकार प्रसन्न होते हैं, वह प्रकार तो जीव नहीं जानता किन्तु अपनी शक्ति के अनुसार२ भक्ति१ करते रहना चाहिये ।
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जिते अंग१ उनमान२ के, तेते३ जीव हु पास ।
जो साहिब सौपी नहीं, सो पावे क्यों दास ॥११॥
जितने भी योग्यता२ के लक्षण१ होते हैं, वे३ जीव के पास ही रहते हैं, जो शक्ति प्रभु ने नहीं दी उसको तो दास कैसे प्राप्त कर सकता है ?
(क्रमशः)

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