शनिवार, 12 अक्टूबर 2019

= ७२ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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७२ - राजमृगाँक ताल
नीके राम कहत है बपुरा१ ।
घर माँहीं घर निर्मल राखै, 
पँचों धोवै काया कपरा ॥ टेक ॥
सहज समर्पण सुमिरण सेवा, 
तिरवेणी तट सँजम सपरा२ ।
सुन्दरि सन्मुख जागण लागी, 
तहं मोहन मेरा मन पकरा३ ॥१॥
बिन रसना मोहन गुण भावै, 
नाना वाणी अनुभव अपरा४ ।
दादू अनहद६ ऐसे कहिये, 
भक्ति तत्व यहु मारग सकरा५ ॥२॥
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भगवद् विरह से दुखी१ साधक अच्छी प्रकार राम का चिन्तन करता है । स्थूल शरीर रूप घर में रहने वाले अन्त:करण घर को काम क्रोधादिक - मल से रहित रखता है और शरीर के रक्षक पँच ज्ञानेन्द्रियों रूप वस्त्रों को शुद्ध विचार - जल से धोकर निर्मल रखता है । मन, प्राण, बुद्धि द्वारा इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना की एकाग्रता रूप त्रिवेणी - संगम के आज्ञा - चक्र तट पर ध्यान रूप स्नान करके सँयम - वस्त्र२(साफी२) से स्वच्छ रखता है ।
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सहजावस्था रूप नैवेद्य समर्पण करता है अर्थात् अपने को निर्विकार करके सहजावस्था में रहता है । इतना होने पर ही हमारी वृत्ति - सुन्दरी प्रभु के सन्मुख अर्थात् ब्रह्माकार हो, अज्ञान निद्रा से जाग कर प्रभु में लगी है । जहां बुद्धि वृत्ति लगी है वहां ही विश्व - विमोहन प्रभु ने मेरे मन को भी पकड़३ लिया है अर्थात् बुद्धि - वृत्ति और मन दोनों प्रभु - परायण रहते हैं । 
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अब हमारा मन सविकल्प समाधि में जिव्हा का आश्रय लिये बिना ही नाना प्रकार से अपनी परा४ व अनुभव वाणी द्वारा भगवान् के गुण गाता है । ऐसे गुण गान करने को ही असीम६ गुणगान करना कहते हैं । यह आन्तर भक्ति - तत्व का मार्ग सूक्ष्म५ है । अत: इसमें सहज ही सब का मन नहीं लगता ।
(क्रमशः)

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