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*अमर ठौर अविनाशी आसन, तहाँ निरंजन लाग रहे ।*
*दादू जोगी जुग जुग जीवै, काल ब्याल सब सहज गये ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सजीवन का अंग ८५*
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नाम ठाम१ निर्भय सदा, सुमिर सजीवन संत ।
तो रज्जब लागे नहीं, तहाँ जोर जम जंत ॥१३॥
निरंजन राम का नाम रूप स्थान१ सदा निर्भय है, संत जन स्मरण करके ही सजीवन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, नाम स्मरण करने वाले के वहां यम के दूत रूप जीवों का बल नहीं चलता ।
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प्राण पिंड ब्रह्माण्ड मध्य, नाम निर्भय दुरंग१ ।
रज्जब चढ चबि२ वास करि, जम जीतै नहिं जंग३ ॥१४॥
हे प्राणी ! शरीर तथा ब्रह्मण्ड में प्रभु का नाम रूप किला१ निर्भय स्थान है, उसके उच्चारण२ द्वारा उस पर चढकर वहां ही निवास कर अर्थात निरंतर स्मरण कर, ऐसा करने से यम युद्ध३ में तुझे नहीं जीत सकेगा ।
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नर निर्भय हरि नाम में, यहु गढ अगम अगाध ।
रज्जब रिपु लागै नहीं, सदा सुखी तहँ साध ॥१५॥
हरि नाम रूप किले पर निर्भय रह सकता है यह गढ अगम अगाध है, इसमें काल रूप शत्रु का दाँव नहीं लगता, वहाँ बसने वाले अर्थात नाम स्मरण करने वाले संत सदा सुखी रहते हैं ।
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नाम ठाम१ निज जीव को, सदा सजीवन वास ।
रज्जब रहिये ठौर तिहिं, षट ॠतु बारह मास ॥१६॥
नाम रूप स्थान१ जीव का निजी है, वहा सदा नवास करने से अर्थात निरंतर नाम का चिन्तन करने से प्राणी सदा जीवित रहने वाले ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है, अत: बारह मास की छओं ॠतुओं में वहाँ रहो अर्थात नाम स्मरण करो ।
(क्रमशः)

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