🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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६३ - आत्मार्थी भेष । घट ताल
सोई सुहागिनि साच श्रृंगार,
तन मन लाइ भजै भरतार ॥टेक॥
भाव भक्ति प्रेम ल्यौ लावै,
नारी सोइ सार सुख पावै ॥१॥
सहज सँतोष शील सब आया,
तब नारी नाह अमोक पाया ॥२॥
तन मन जौबन सौंप सब दीन्हा,
तब कंत रिझाइ आप बस कीन्हा ॥३॥
दादू बहुरि वियोग न होई,
पिव सौं प्रीति सुहागिनि सोई ॥४॥
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आत्म स्वरूप ब्रह्म प्राप्ति में उपयोगी भेष बता रहे हैं -
जो तन मन को लगाकर अपने स्वामी की सेवा करती है, वही सुहागिनी है और उसी का साधन - श्रृंगार सत्य है ।
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जो श्रद्धापूर्वक प्रेमाभक्ति से अपनी वृत्ति प्रभु में लगाती है, वह सँतात्मारूप नारी ही सार रूप ब्रह्मानन्द प्राप्त करती है ।
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जब स्वाभाविक सँतोष, शील आदि सब दिव्य गुण हृदय में आये हैं, तब ही साधक आत्मा रूप नारियों ने अपार महिमा युक्त परब्रह्म पति को प्राप्त किया है ।
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जब अपना तन, मन और सम्पूर्ण कर्त्तव्य रूप यौवन प्रभु के समर्पण किया है, तब ही सँतात्माओं ने प्रभु को प्रसन्न करके अपने अनुकूल किया है ।
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पुन: वियोग न हो, ऐसी प्रीति प्रभु से जिसने की है, वही सँतात्मा सदा सुहागिनी है ।
(क्रमशः)

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