शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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६६ - नटताल
भाई रे, ऐसा पँथ हमारा ।
द्वै पख रहित पँथ गह पूरा, अवरण एक अधारा॥टेक॥
वाद विवाद काहू सौं नाँहीं, माँहिं जगत तैं न्यारा ।
सम दृष्टि स्वभाव सहज में, आपहि आप विचारा ॥१॥
मैं तैं मेरी यहु मति नाँहीं, निर्वैरी निरकारा ।
पूरण सबै देख आपा पर, निरालम्ब निरधारा ॥२॥
काहू के संग मोह न ममता, संगी सिरजनहारा ।
मनहीं मन सौं समझ सयाना, आनँद एक अपारा ॥३॥
काम कल्पना कदे न कीजे, पूरण ब्रह्म पियारा ।
इहिं पथ पहुंच पार गह दादू, सो तत सहज संगारा ॥४॥
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हे भाई ! हमारा पँथ तो ऐसा है - उसमें एक ब्रह्म का ही आधार रहता है, हिन्दू मुसलमान पना आदि द्वैत पक्ष नहीं होता । न वर्ण विभाग ही है । उसको जो ग्रहण करता है, वह पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त होकर, स्वयँ भी पूर्ण ही हो जाता है ।
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उसमें किसी से वाद - विवाद करने की आवश्यकता नहीं रहती । उसका पथिक, जगत् में रह कर भी, जगत् से अलग ही रहता है । सहज स्वभाव ही उसमें समदृष्टि रहती है तथा अपने आप ही आत्म - स्वरूप का विचार रहता है ।
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"मैं, तूँ, मेरी, तेरी ।" यह भेद बुद्धि उसमें नहीं रहती । वह सब से निर्वैर होकर, अपने पराये सबमें निराकार, निरालम्ब, पूर्ण ब्रह्म को निश्चयपूर्वक देखकर सम हो जाता है ।
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किसी के साथ मोह ममता नहीं करता । परमात्मा को ही अपना साथी समझता है तथा वह बुद्धिमान् विचार द्वारा अपने मन ही मन में समझकर अपार अद्वैतानन्द को प्राप्त होता है ।
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अत: साँसारिक - कामना युक्त कल्पना कभी भी मत कर और इस उक्त मार्ग के द्वारा सँसार के पार पहुंच कर परम प्रिय पूर्ण ब्रह्म को अद्वैतात्म रूप से ग्रहण कर । वही परब्रह्म - तत्व हमने सहज समाधि में देखा है ।
(क्रमशः)

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