शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

= *सजीवन का अंग ८५(२५/२८)* =

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*दादू पाका मन डोलै नहीं, निश्चल रहै समाइ ।*
*काचा मन दह दिशि फिरै, चंचल चहुँ दिशि जाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सजीवन का अंग ८५*
मिले न स्वारथ शाह को, त्याग दिई पख दोय । 
ज्ञान गिरंदों१ में रहै, रज्जब राणा होय ॥२५॥ 
महाराणा प्रताप बादशाह से नहीं मिले और न किसी अन्य का आश्रय लिया, स्वतंत्र राणा होकर पर्वतों१ में रहे, तब अन्त में विजयी हुये, वैसे ही जिसमें स्वार्थ और हिन्दु-मुसलमानादि उभय पक्ष को त्याग दिया है और ज्ञान में रहता है वह सजीवन ब्रह्म को प्राप्त होकर ही रहेगा । 
रज्जब उदधि१ ज्ञान में मीन मन, सूर२ शक्ति तप अंग३ । 
उभय४ न दग्ध५ हिं उभय तन, पाया शीतल संग ॥२६॥ 
समुद्र१ में मच्छी के शरीर३ पर सूर्य२ का ताप नहीं लगता और ज्ञान में रहने पर मन को माया से होने वाल दुख नहीं होता । समुद्र और ज्ञान में रहने से सूर्य और माया इन दोनों४ ताप और चिन्ता से मच्छी और ज्ञानी इन दोनों का शरीर नहीं जलता५, कारण मच्छी और ज्ञानी ने शीतल समुद्र और ज्ञान का संग प्राप्त कर लेता है । 
रज्जब सूर१ शरीर विधि, आतम अकलि२ सु अंभ३ । 
सो सोखे देखत सबै, सीझै४ और सीर५ सु थंभ६ ॥२७॥ 
जैसे तालाब के जल३ को सूर्य१ सबके देखते शोषण करते हैं, वैसे ही काल जीवात्मा का शोषण करता है किन्तु जो जल शीत५ के द्वारा स्थभिंत६ रहता है, उसे सूर्य नहीं सुखाते, गलने पर ही सुखाते हैं, वैसे ही जो जीवात्मा ज्ञान२ के द्वारा सिद्धावस्था४ को प्राप्त हो जाता है उसका शोषण काल नहीं कर सकता । 
पादशाह पहरे भया, तब देशहु कर नाँहिं । 
रज्जब चोर कहा करै, जे राजा चेतन माँहिं ॥२८॥ 
बादशाह पहरे द्वारा रक्षा करता है, तब देश को डर नहीं रहता । देश में राजा सावधान रहेगा तब चोर क्या कर सकेगा ? वैसे ही भगवान रक्षा करे तब काल क्या कर सकता है ?
(क्रमशः)

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