🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ ।*
*दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥*
===================
साभार ~ Narayan Joshi
|| परमात्मा एक अनुभव ||
मैंने सुना है, और टाल्सटाय ने उस पर एक कहानी भी लिखी है, कि रूस में एक झील के किनारे तीन फकीरों का नाम बड़ा प्रसिद्ध हो गया था। और लोग लाखों की तादाद में उन फकीरों का दर्शन करने जाने लगे। और वे फकीर महामूढ़ थे, बिलकुल गैर पढ़े—लिखे थे। कुछ धर्म का उन्हें पता ही नहीं था। यह खबर रूस के आर्च प्रीस्ट को, सबसे बड़े ईसाई पुरोहित को लगी। उसे बड़ी हैरानी हुई। क्योंकि ईसाई चर्च तो कानूनन ढंग से लोगों को संत घोषित करता है, तभी वे संत हो पाते हैं।
.
यह भी बड़े मजे की बात है! ईसाई चर्च तो घोषणा करता है कि फलां आदमी संत हुआ। और जब पोप इसकी गारंटी दे देता है कि फलां आदमी संत हुआ, तभी वह संत माना जाता है। इसलिए ईसाइयत में एक मजेदार घटना घटती है कि दो—दो सौ, तीन—तीन सौ साल हो जाते हैं आदमी को मरे हुए, तब चर्च उनको संत घोषित करता है।
.
जिंदों को तो जला दिया कई दफा चर्च ने। जान आफ आर्क को जलाया, वह जिंदा थी तब। फिर सैकड़ों साल बाद उसको संतत्व की पदवी घोषित की, कि वह भूल हो गई, वह संत थी। अभी संत कैसे हो गए ये ! हिंदुस्तान होता तो चलता, यहां कोई भी संत हो सकता है। इसकी कोई तकलीफ नहीं है।
.
लेकिन रूस में तकलीफ हुई कि ये संत हो कैसे गए ! तो आर्च प्रीस्ट बड़ा परेशान हुआ। और जब उसे पता चला कि लाखों लोग वहां जाते हैं, तो उसने कहा, यह तो हद हो गई! यह तो चर्च के लिए नुकसान होगा। ये कौन लोग हैं! इनकी परीक्षा लेनी जरूरी है।
.
तो आर्च प्रीस्ट एक मोटर बोट में बैठकर झील में गया। जाकर वहां पहुंचा, तो वे तीनों झाड़ के नीचे बैठे थे। देखकर वह बडा हैरान हुआ। सीधे—सादे ग्रामीण देहाती मालूम पड़ते थे। वह जाकर जब खड़ा हुआ, तो उन तीनों ने झुककर नमस्कार किया, उसके चरण छुए।
.
उसने कहा कि बिलकुल नासमझ हैं। इनकी क्या हैसियत ! उसने बहुत डांटा—डपटा, फटकारा कि तुम यह क्यों भीड़— भाड़ यहां इकट्ठी करते हो? उन्होंने कहा, हम नहीं करते। लोग आ जाते हैं। आप उनको समझा दें। पूछा कि तुमको किसने कहा कि तुम संत हो?
.
लोग कहने लगे। हमको कुछ पता नहीं है। तुम्हारी प्रार्थना क्या है? बाइबिल पढ़ते हो? उन्होंने कहा, हम बिलकुल पढ़े—लिखे नहीं हैं। तुम प्रार्थना क्या करते हो? क्योंकि चर्च की तो निश्चित प्रार्थना है। तो उन्होंने कहा, हमको तो प्रार्थना कुछ पता नहीं। हम तीनों ने मिलकर एक बना ली है। तुम कौन हो बनाने वाले प्रार्थना? प्रार्थना तो तय होती है पोप के द्वारा। बिशप्स की बड़ी एसेंबली इकट्ठी होती है, तब एक—एक शब्द का निर्णय होता है। तुम कौन हो प्रार्थना बनाने वाले? तुमने अपनी निजी प्रार्थना बना ली है! भगवान तक जाना हो, तो बंधे हुए रास्तों से जाना पड़ता है! क्या है तुम्हारी प्रार्थना?
.
वे तीनों बहुत घबड़ा गए। कंपने लगे। सीधे—सादे लोग थे। तो उन्होंने कहा, हमने तो एक छोटी प्रार्थना बना ली है। आप माफ करें, तो हम बता दें। ज्यादा बड़ी नहीं है, बहुत छोटी—सी है। ईसाइयत मानती है कि परमात्मा के तीन रूप हैं, ट्रिनिटी। त्रिमूर्ति परमात्मा है। परमात्मा है, उसका बेटा है, होली घोस्ट है। ये तीन रूप हैं परमात्मा के।
.
तो उन्होंने कहा कि हमने तो एक छोटी—सी प्रार्थना बना ली। यू आर थी, वी आर श्री, हैव मर्सी आन अस। तुम भी तीन हो, हम भी तीन हैं, हम पर कृपा करो। यही हमारी प्रार्थना है। उस पादरी ने कहा, नासमझो, बंद करो यह बकवास। यह कोई प्रार्थना है? सुनी है कभी? और तुम मजाक करते हो भगवान का कि तुम भी तीन और हम भी तीन हैं?
.
उन्होंने कहा, नहीं, मजाक नहीं करते। हम भी तीन हैं। और हमने सुना है कि वह भी तीन है। उसका तो हमें पता नहीं। बाकी हम तीन हैं। और हम ज्यादा कुछ जानते नहीं। हमने सोचा, हम तीन हैं, वे भी तीन हैं, तो हम तीनों पर कृपा कर। उसने कहा कि यह प्रार्थना नहीं चलेगी। आइंदा करोगे, तो तुम नरक जाओगे। तो मैं तुम्हें प्रार्थना बताता हूं आथराइज्ड, जो अधिकृत है।
.
उसने प्रार्थना बताई। उन तीनों को कहलवाई। उन्होंने कहा, एक दफा और कह दें, कहीं हम भूल न जाएं। फिर एक दफा कही। फिर उन्होंने कहा, एक दफा और। कहीं भूल न जाएं। उसने कहा, तुम आदमी कैसे हो? तुम संत हो? तो उन्होंने कहा, नहीं, हम कोशिश तो पूरी याद करने की करेंगे, एक दफा आप और दोहरा दें ! उसने दोहरा दी।
.
फिर पादरी वापस लौटा। जब वह आधी झील में था, तब उसने देखा कि पीछे वे तीनों पानी पर भागते चले आ रहे हैं। तब उसके प्राण घबड़ा गए। उसने अपने माझी से कहा कि यह क्या मामला है? ये तीनों पानी पर कैसे चले आ रहे हैं? उस माझी ने कहा कि मेरे हाथ—पैर खुद ही कैप रहे हैं। यह मामला क्या है ! वे तीनों पास आ गए।
.
उन्होंने कहा, जरा रुकना। वह प्रार्थना हम भूल गए; एक बार और बता दो ! उस पादरी ने कहा कि तुम अपनी ही प्रार्थना जारी रखो। हमारी प्रार्थना तो कर—करके हम मर गए, पानी पर चल नहीं सकते। तुम्हारी प्रार्थना ही ठीक है। तुम वही जारी रखो। वे तीनों हाथ जोड़कर कहने लगे कि नहीं, वह प्रार्थना ठीक नहीं। मगर आपने जो बताई थी, बड़ी लंबी है और शब्द जरा कठिन हैं। और हम भूल गए। हम बेपढ़े—लिखे लोग हैं।
.
यह घटना टाल्सटाय ने लिखी है। ये तीन आदमी बिलकुल पंडित नहीं हैं, विनम्र भोले— भाले लोग हैं। लेकिन एक निजी अनुभव घटित हुआ है। और निजी अनुभव के लिए कोई अधिकृत प्रार्थनाओं की जरूरत नहीं है। और निजी अनुभव के लिए कोई लाइसेंस्ट शास्त्रों की जरूरत नहीं है।
.
और निजी अनुभव का किसी ने कोई ठेका नहीं लिया हुआ है। हर आदमी हकदार है पैदा होने के साथ ही परमात्मा को जानने का। वह उसका स्वरूपसिद्ध अधिकार है। वह मैं हूं यही काफी है, मेरे परमात्मा से संबंधित होने के लिए। और कुछ भी जरूरी नहीं है। बाकी सब गैर—अनिवार्य है।
.
लेकिन जो जानकारी हम इकट्ठी कर लेते हैं, वह जानकारी हमारे सिर पर बोझ हो जाती है। वह जो भीतर की सरलता है, वह भी खो जाती है। पंडित भी उसे पा सकते हैं, लेकिन पांडित्य को उतारकर रख दें तो ही।
.
और तत्व—ज्ञान मैं हूं। ज्ञान नहीं, जानकारी नहीं, सूचना नहीं, शास्त्रीयता नहीं, आत्मिक अनुभव। और निश्चित ही, उस आत्मिक अनुभव में, जहां एक भी शब्द नहीं होता, व्यक्ति होता है और अस्तित्व होता है और दोनों के बीच की सब दीवालें गिर गई होती हैं, वहां जो होता है, वही परमात्मा है।
.
इसे हम ऐसा कहें, परमात्मा का अनुभव नहीं होता; एक अनुभव है, जिसका नाम परमात्मा है। परमात्मा का कोई अनुभव नहीं होता।
.
ऐसा नहीं होता कि आपके सामने परमात्मा खड़ा है, और आप अनुभव कर रहे हैं। इसमें तो दूरी रह जाएगी। एक अनुभव है, जहां व्यक्ति समष्टि में लीन हो जाता है। उस अनुभव का नाम ही परमात्मा है। शायद कठिन मालूम पड़े। परमात्मा का कोई अनुभव नहीं होता, देअर इज नो एक्सपीरिएंस ऑफ गॉड, बट ए सटेंन एक्सपीरिएंस इज नोन एज गॉड। एक खास अनुभव !
.
वह अनुभव क्या है? वह अनुभव है, जहां बूंद सागर में खोती है। जहां बूंद सागर में खोती है, तो बूंद को जो अनुभव होता होगा! जैसे व्यक्ति जब समष्टि में खोता है, तो व्यक्ति को जो अनुभव होता है, उस अनुभव का नाम परमात्मा है।
.
परमात्मा एक अनुभव है, वस्तु नहीं। परमात्मा एक अनुभव है, व्यक्ति नहीं। परमात्मा एक अनुभव है, एक घटना है। और जो भी तैयार है उस घटना के लिए, उस एक्सप्लोजन के लिए, उस विस्फोट के लिए, उसमें घट जाती है। और तैयारी के लिए जरूरी है कि अपना अज्ञान तो छोड़े ही, अपना ज्ञान भी छोड़ दें। अज्ञान तो छोड़ना ही पड़ेगा, ज्ञान भी छोड़ देना पड़ेगा। और जिस दिन ज्ञान— अज्ञान दोनों नहीं होते, उसी दिन जो होता है, उसका नाम परमात्मा है।
.
आज इतना ही। लेकिन पांच मिनट रुकें। बीच में कोई उठ जाता है, दूसरों को तकलीफ होती है। पांच मिनट और बैठें। कीर्तन के बाद जाएं।
.
ओशो - गीता दर्शन – भाग–5, - अध्याय—10
(प्रवचन—चौदहवा) — परम गोपनीय—मौन
.
(साभार : @Govinda misra)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें