#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= फुटकर काव्य १.चौबोला - १७ =*
.
*थरौ लीपि का कीजिये शिवहार हि पय पान ।*
*बहर बलाइन समझई बौरी नैक न ज्ञान ॥१७॥*
अरी साधिके ! इस स्थान शुद्धि या शरीर शुद्धि आदि से क्या तुझको प्रभु का साक्षात्कार हो सकेगा ? ये शंकर के आभूषण(सर्प) को दूध पिलाने के समान हैं । ये सब तो बाहर से आयी विपत्ति के समान हैं । अरी पागल ! तुझको इतना भी ज्ञान नहीं है ! ॥
(इस दोहे में चार ग्रामों के नाम निकलते हैं – १. थरौली, २. शिवहार(सिंवार) ३. बहर = बहराँवड़ा(जयपुर) एवं ४. बौंली(जि. जयपुर) ये सब उसी क्षत्र में हैं जहाँ श्री सुन्दरदास रामत किया करते थे ॥)
॥ फुटकर काव्य का चौबाला भाग सम्पन्न ॥
॥ इति चौबोला ॥१॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें