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*नाद बिंदु सौं घट भरै, सो जोगी जीवै ।*
*दादू काहे को मरै, राम रस पीवै ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सजीवन का अंग ८५*
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अरि इन्द्री आपा गये, अंतक उठ्या अनंग ।
रज्जब जीवै जीव सो, काट्या कर्म कुसंग ॥९॥
इन्द्रिय रूप शत्रुओं की चंचलता ओर अहंकार चले जाने पर काम रूप काल भी उठ जाता है । जो कुसंग में नहीं बैठता तथा ज्ञान द्वारा कर्मों को काट डालता है, वह जीव ब्रह्मरूप होकर जीवित रहता है ।
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रज्जब मुये जु मारते, विनशै वैरी पंच ।
तब ताको लागै नहीं, जरा मरण जम अंच ॥१०॥
जो मरते थे वे काम क्रोधादि मर गये ओर पंच ज्ञानेन्द्रिय रूप शत्रुओं के चंचलादि दोष भी नष्ट हो गये, तब उस व्यक्ति को वृद्धावस्था, मरण और यम का दंड रूप दु:ख नहीं होता, वह तो ब्रह्मरूप हो जाता है ।
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सुरति माँहिं सांई सदा, याद अखंडित होय ।
सो रज्जब आतम अमर, विघ्न न व्याधै कोय ॥११॥
जिसकी वृति में सदा अखंडित ब्रह्म का स्मरण होता है, उस पर कोई भी विघ्न का प्रभाव नहीं पड़ता, वह आत्मा रूप होकर अमर हो जाता है ।
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मन उनमनि१ ले राखिये, परम शून्य अस्थान ।
तो रज्जब लागै नहीं, जम जालिम२ का बान ॥१२॥
मन को समाधि१ में ले जाकर, परमशून्य ब्रह्मरूप स्थान में रखना चाहिये । ऐसा करोगे तो तुम्हारे क्रूर२ यम का बाण नहीं लग सकेगा ।
(क्रमशः)

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