मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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६२ - विरह । घटताल
हम सब नारी एक भरतार, 
सब कोई तन करैँ श्रृंगार ॥टेक॥
घर घर अपने सेज संवारैं, 
कँत पियारे पँथ निहारैं ॥१॥
आरत अपने पीव को धावैं, 
मिलै नाह१ कब अँग लगावैं ॥२॥
अति आतुर ये खोजत डोलैं, 
बाह्य परी वियोगिनी बोलैं ॥३॥
सब हम नारी दादू दीन, 
दे सुहाग काहू संग लीन ॥४॥
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विरह दिखा रहे हैं - 
हम सभी सँतात्मा रूप नारियों के स्वामी एक परमात्मा ही हैं और हम सब ही अपने इन्द्रियादि शरीर को निर्दोष करना रूप श्रृंगार कर रही हैं तथा 
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अपने - अपने अन्त:करण घर की वृत्ति - शय्या को ब्रह्माकार रूप से सजा रही हैँ और प्यारे परब्रह्म स्वामी का मार्ग देख रही हैं । 
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वियोग से दु:खी होकर अपने प्रभु को प्राप्त करने के लिये ध्यान - साधन रूप दौड़ लगा रही हैं तथा मन में विचार कर रही हैं, वे स्वामी१ कब मिलेंगे और कब हमें अपने स्वरूप में एक करेंगे । 
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हे प्रभो ! ये हम सब वियोगिनी सँतात्मा रूप दीन नारियाँ, अति व्यथित होकर, आप को खोजती फिर रही हैं और पुकार रही हैं । 
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आपको पुकारने का तो हमारा स्वभाव ही हो गया है, किन्तु आप सुनते ही नहीं । क्या पता किस के संग लीन हो रहे हो ? अब तो कृपा करके हमको भी नित्य मिलन रूप सुहाग दो ।
(क्रमशः)

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