सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

= सुन्दर पदावली(फुटकर काव्य २.गूढार्थ - ३/४) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= फुटकर काव्य २.गूढार्थ - ३/४ =* 
*राम लक्षमन शत्रुघन भरत जानि करि प्रीति ।* 
*सीतां शान्ति सदा रहै यह सन्तन की रीति ॥३॥* 
तृतीय छन्द : (क) जो साधक काम, क्रोधादि शत्रुओं के समूह(घन) को इस शरीर में प्रविष्ट होता हुआ जान कर, प्रीति(भक्ति) के लक्ष्य राम में सीता रूप शान्ति(परम आनन्द) को भी रखते हैं वे ही साधना की अंतिम अवस्था तक पहुँच पाते हैं, सन्तों की यह रीति(मत) है ॥ 
(ख) जो साधक लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न आदि का स्मरण रखता हुआ राम की भक्ति करता है वही तुरीयावस्था तक पहुँच सकता है, अन्य नहीं – ऐसा सन्तों का मत है ॥३॥ 
*हनूमान कूं जांनि कैं सुग्रीवहि रटि राम ।* 
*बालि कनक तौरै श्रवन अंगद कौनैं काम ॥४॥* 
चतुर्थ छन्द : (क) यदि साधक को प्रभु का साक्षात्कार करना है तो उसे अपने अभिमान का पूर्णतः त्याग कर मधुर कण्ठ से उसके नाम का कीर्तन करना चाहिये । अन्यथा उसका यह कार्य ऐसा ही होगा जैसे भारी कर्णाभूषण पहनने पर कर्ण को कष्ट होने लगता है ॥ 
(ख) सुग्रीव तथा हनुमान द्वारा की गयी कठोर भगवत्सेवा को ध्यान में रखकर ही साधक को भगवत्सेवा में लग्न चाहिये । अन्यथा........... पूर्ववत् ........ कष्ट होता है ॥४॥
(क्रमशः)

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