मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग ६१/६५

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
*दादू कद यहु आपा जाइगा, कद यहु बिसरै और ।* 
*कद यह सूक्ष्म होइगा, कद यहु पावै ठौर ॥६१॥* 
*दादू विषम दुहेला जीव को, सतगुरु तैं आसान ।* 
*जब दरवै तब पाइए, नेड़ा ही अस्थान ॥६२॥* 
शिष्य प्रश्न करता है- हे भगवन् ! देहादि अनात्मपदार्थों का आत्मा में ‘मैं’ देह हूँ, कृश हूँ’ -यह अध्यास कब निवृत्त होगा? और मेरा वह मन कब हरि को भजेगा? और संसार की आसक्ति कब दूर होगी? और कब ब्रह्म को पाऊँगा? और पता नहीं कि मेरा अज्ञान कब दूर होगा? मैं तो मानता हूँ कि मेरे लिये यह सब असम्भव ही है । 
इसका समाधान करते हुए श्रीदादूमहाराज कहते हैं- निराश होने की आवश्यकता नहीं, जब गुरुकृपा होगी तब सब ठीक हो जायेगा । गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान से तुम्हारी अविद्या की निवृत्ति उसी प्रकार हो जायेगी, जैसे सूर्योदय के समकाल में ही रात्रि का अन्धकार नष्ट हो जाता है । गुरुगीता में लिखा है- 
“इस संसार सागर को पार करने के लिये गुरुदेव ही कर्णधार हैं, उनके वाक्य, बहती हुई दृढ़ नौका है, उन वाक्यों के अभ्यास की शक्ति से संसार-सागर को पार कर जाता है ।” 
और भी कहा है- 
विषयों का त्याग जीव के लिये दुर्लभ ही है और तत्त्वदर्शन भी दुर्लभ है । इसी तरह सहजावस्था-प्राप्ति भी दुर्लभ है । परन्तु सद्गुरु-कृपा से यह सब सहज में ही अधिगत हो जाते हैं ॥६१-६२॥ 
*गुरु ज्ञान* 
*दादू नैन न देखे नैन को, अन्तर भी कुछ नाहिं ।* 
*सतगुरु दर्पण कर दिया, अरस परस मिलि माहिं ॥६३॥* 
*घट घट राम रतन है, दादू लखै न कोइ ।* 
*सतगुरु सब्दौं पाइये, सहजैं ही गम होइ ॥६४॥* 
*जब ही कर दीपक दिया, तब सब सूझन लाग ।* 
*यों दादू गुरु ज्ञान थैं, राम कहत जन जाग ॥६५॥* 
कोई भी पुरुष एक नेत्र दूसरे नेत्र को अत्यधिक व्यवधान न होने पर भी नहीं देख सकता । परन्तु यदि वही हाथ में दर्पण रखकर देखे तो उन दोनों का पारस्परिक ज्ञान अनायास ही प्राप्त कर लेता है । ऐसे ही आत्मा समीप ही है परन्तु अज्ञानी उस को नहीं जान सकता । गुरुप्रदत्त ज्ञान द्वारा तो ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होने से अज्ञानजन्य भ्रान्ति के दूर होने से ‘मैं ब्रह्म हूँ’-ऐसा साक्षात्कार हो जाता है । योगवासिष्ठ में लिखा है- 
“इतने समय तक मैं यह नहीं जान सका कि मैं कौन हूँ? यह एक बड़ा आश्चर्य है । मेरा यह दृढ़ अहंकार ही है कि शरीर को ही आत्मा मानता हूँ।” 
अब मैं गुरुकृपा से जान गया कि मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ । तब मेरा अहंकाररूपी काला बादल भी नष्ट हो गया । 
आपने जैसा आत्मा का स्वरूप बतलाया वह मुझे प्राप्त हो गया है और मैं उसे प्राप्त करके अपनी आत्मा की अनुभूति में लग गया हूँ । 
जैसे कि किसी के हाथ में दीपक हो तो उसे अनायास ही सब वस्तुएं ज्ञात हो जाती है, उसी प्रकार ज्ञानदीपक जिसके अन्तःकरण में पैदा हो गया वह ब्रह्मतत्त्व को जान कर जग जाता है । अतः गुरु से ज्ञानप्राप्ति हेतु यत्न करना चाहिये । 
मैं अहन्ता ममतारूपी स्वप्न देख रहा था और दुःख पा रहा था । भगवान् महादेव गुरुजी के मुखारविन्द से “तत्त्वमसि” आदि वाक्यों का स्पष्ट उपदेश सुनकर मेरे हृदयाकाश में मेरे आत्म रूप सूर्य का उदय हो गया है । अब मैं जाग उठा हूँ ॥६३-६४-६५॥
(क्रमशः)

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