गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू है को भय घणां, नाहीं को कुछ नाहीं ।*
*दादू नाहीं होइ रहु, अपणे साहिब माहिं ॥*
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कहीं ऐसा न हो कि सहारा न लेना अहंकार हो। अगर अहंकार के कारण कहते हैं, क्यों लें सहारा, तो बड़े खतरे में पड़ेंगे। साक्षी के कारण अगर कहते हैं कोई सहारे की जरूरत नहीं, तब ठीक है। इन दोनों में भेद करना। अहंकार की अगर यह घोषणा हो..।
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अधिक अहंकारी ईश्वर को मानने को राजी नहीं होते। यही फर्क है। भगवान महावीर ईश्वर को नहीं मानते, चार्वाक भी ईश्वर को नहीं मानते। मार्क्स भी ईश्वर को नहीं मानते, भगवान बुद्ध भी ईश्वर को नहीं मानते। पर इनमें कुछ फर्क है। मार्क्स या नीत्शे या चार्वाक—इनका अस्वीकार अहंकार के कारण है। ये कहते हैं, मैं हूं; परमात्मा हो कैसे सकता है?
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भगवान बुद्ध और भगवान महावीर कहते हैं : मैं तो हूं ही नहीं, परमात्मा की जरूरत क्या है? जब मैं ही नहीं हूं...। मैं को मिटाने के लिए परमात्मा का सहारा लिया जाता है। अगर मैं नहीं हूं तो फिर परमात्मा के सहारे की भी कोई जरूरत नहीं है। बीमारी ही नहीं तो औषधि की क्या जरूरत? तो ध्यान से देख लें, अगर बीमारी हो तो औषधि की जरूरत है।
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'समर्पण'—दोनों एक ही शब्द का उपयोग करते हैं। लेकिन दोनों के अर्थ अलग हैं। जब भक्त कहता है समर्पण, तो वह कहता है किन्हीं चरणों में। और जब ज्ञानी कहता है समर्पण, तो वह कहता है, यहां कोई नहीं, किससे लड़ रहे? लड़ना बंद करो। छोड़ो लड़ना। जो है, जैसा है, वैसे में राजी हो जाओ। ज्ञानी के समर्पण का अर्थ है तथाता। जैसा है उसके साथ राजी हो जाओ। भक्त के समर्पण का अर्थ है : अपने को मिटा दो। जो है उसमें लीन हो जाओ। अंतिम घड़ी में दोनों मिल जाते हैं।
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भेद भाषा का है। भक्त की भाषा रसपूर्ण है। भक्त प्रेम की भाषा बोलता है; प्रार्थनापूर्ण भाषा बोलता है। भक्त का अर्थ है स्त्रैण हृदय। साक्षी का अर्थ है : पुरुष हृदय। और जब कहते हैं,स्त्रैण हृदय तो यह न समझें कि स्त्रैण हृदय सिर्फ स्त्रियों के पास होता है। बहुत पुरुषों के पास स्त्रैण हृदय है। और जब कहा जाता है पुरुष हृदय, तो ऐसा न सोचें कि सिर्फ पुरुषों के पास होता है। बहुत स्त्रियों के पास पुरुष का हृदय होता है। पुरुष हृदय और स्त्रैण हृदय का संबंध शरीर से नहीं के बराबर है।

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