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*बारहमासी नीपजै, तहाँ किया परवेश ।*
*दादू सूखा ना पड़ै, हम आये उस देश ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*निष्पक्ष मध्य का अंग ८८*
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चंद सूर पाणी पवन, आभे१ उडग२ अतीत३ ।
धर४ अम्बर५ परसै नहीं, यहु तीजी रस रीत ॥१३॥
चन्द्रमा, सूर्य, जल, वायु, बादल१ और तारे२ ये सब पृथ्वी४ वा आकाश५ की पक्ष नहीं पकड़ते, वैसे ही संत३ किसी की पक्ष नहीं करते । यह तीसरी मध्यमार्ग की पद्धति ही रस रूप ब्रह्म को प्राप्त कराने वाली है ।
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पग पृथ्वी मस्तक गगन, जीव रहै नभि१ थान ।
पख पोखै निर्पख रहै, आतम संत सुजान ॥१४॥
बुद्धिमान संतात्मा के पैर पृथ्वी पर रहते हैं, शिर आकाश में रहता है और जीव नाभि१ स्थान में प्रभु के पास रहता है । इस प्रकार संतात्मा पृथ्वी - आकाश रूप पक्षों का ही पैर-शिर द्वारा पोषण करते हुये निष्पक्ष रहता है ।
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जड़ मत छाड़ सु जमीं१ घर, तज अभिमान अकाश ।
रज्जब रहिये बीच बस, षट् ॠतु बारह मास ॥१५॥
जड़ बुद्धिरूप पृथ्वी१ का घर छोड़ो और अभिमान रूप अकाश छोड़ो, इन दोनों के बीच मध्य मार्ग में ही छ: ॠतु और बारह मास सदा ही निवास करते रहो ।
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आकाश रूप अविगत१ तरु, बइये बंद२ हु ठाम ।
पंच तिणे रज्जब रचे, मध्य मनोहर धाम ॥१६॥
जैसे बइया पक्षी वृक्ष की शाखा में तृणों द्वारा मनोहर घर बनाकर आकाश में रहता है, वैसे ही संत२ ब्रह्म१ रूप आकाश के बीच में पंच ज्ञानेन्द्रियों को निग्रह करना रूप धाम बनाता है और उस एकाग्रता रूप स्थान में निष्पक्ष होकर सदा रहता है ।
(क्रमशः)

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