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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*फल कारण सेवा करै, जाचै त्रिभुवन राव ।*
*दादू सो सेवक नहीं, खेलै अपना दाव ॥*
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साभार ~ Soni Manoj
🍁*आध्यात्मिक वही है जिसकी कोई चाह नहीं*🍁
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जब मैं कहता हूं, चाह छोडो़, तो बेशर्त कह रहा हूं । यह नहीं कह रहा हूं कि संसार की चाह छोडो़ ।
फिर दोहरा दूं : चाह संसार है । संसार की कोई चाह नहीं होती और परमात्मा की कोई चाह नहीं होती । जहां चाह है, वहां संसार है । अगर तुम परमात्मा चाहते हो, तो तुम अभी भी सांसारिक हो ।
इसलिए तो मैं कहता हूं : तुम्हारे ऋषि-मुनि जो मंदिरों में और गुफाओं में बैठे हैं - सब संसारी हैं; तुम जैसे संसारी हैं; जरा भेद नहीं है । स्वर्ग चाह रहे हैं ! स्वर्ग में क्या चाह रहे हैं ? वही अप्सराएं, जिनको तुम यहां चाह रहे हो । तुम फिल्म अभिनेत्रियों में देख रहे हो, तुम जरा आधुनिक हो, वे जरा प्राचीन हैं । वे जरा उर्वशी इत्यादि की सोच रहे हैं ! वे पुरानी अभिनेत्रियां ! वे सोच रहे हैं : वहां मिलेगा ।
तुम सोचते हो : यहीं चले जाएं बाजार में और दो कुल्हड़ पी लें । और वे सोचते हैं कि वहां पीएंगे बहिश्त में, जहां झरने बह रहे हैं शराब के । यहां क्या पीना ! फिर मुफ्त मिलती है वहां । कोई पाबंदी भी नहीं है । असली शराब मिलती है वहां । ऐसा कोई देशी ठर्रा नहीं । वहां कोई स्वदेशी की झंझट नहीं है । विदेशी शराब के झरने बह रहे हैं । नहाओ, धोओ, डुबकी लगाओ । पीओ, पिलाओ । या वहां कल्पवृक्ष है, जिनके नीचे बैठो और जो चाहो, तत्क्षण पूरा हो जाए । तत्क्षण - चाहा कि पूरा हो जाए ।
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स्वर्ग के चाहने वाले, तुम सोचते हो, आध्यात्मिक हैं ? या कि तुम सोचते हो, मोक्ष को चाहने वाले आध्यात्मिक हैं ? मोक्ष में भी क्या चाह रहे हो ? यही कि शांति मिले; आनंद मिले; दुख से छुटकारा हो;
पीडा़ न रहे ।
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मगर यही तो सांसारिक आदमी भी चाह रहा है । वह भी इसीलिए तो धन कमा रहा है कि दुख न रहे । इसलिए तो चाहता है बडा़ मकान बना ले कि थोडी़ सुविधा हो । तुम्हारी और उसकी चाह में कोई मौलिक भेद नहीं है । भेद होगा अगर तो परिणाम का होगा, गुण का नहीं है ....
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तुम भला उससे कह सकते हो कि तेरी चाह क्षणभंगुर है, हमारी चाह शाश्वत की है । लेकिन इसका तो मतलब यही हुआ कि तुम उससे भी बडे़ संसारी हो । उसकी चाह क्षणभंगुर की है; उसकी चाह छोटी है । तुम्हारी चाह बडी़ भयंकर है; सनातन की है; शाश्वत की है ! तुम क्षणभंगुर से राजी नहीं होते । तुम्हारा लोभ बहुत बडा़ है । तुम भयंकर संसारी हो !
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फिर मैं किसको आध्यात्मिक कहता हूं - जिसकी कोई चाह नहीं; जो बिना चाह जीता है । जो कहता है : यहीं जीएंगे, अभी जीएंगे । जिसके लिए वर्तमान कल्पवृक्ष है । जिसके लिए, जैसा है, वैसा होना स्वर्ग है । जहां है, वहीं मोक्ष । ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक है । जिसके पास अन्यथा की कोई मांग नहीं है । कल जो आएगा, आएगा । अभी जो है, उसे भोगता है । अभी जो है, उसे बडे़ आनंद से भोगता है, बडे़ अनुग्रह से भोगता है ।
ओशो 🍂 एस धम्मो सनंतनो १२
प्रवचन १२२ से संकलन ।
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