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*अमृत भोजन राम रस, काहे न विलसै खाइ ।*
*काल विचारा क्या करै, रम रम राम समाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*जीव ब्रह्म अंतराय निर्णय का अंग ८६*
इस अंग में जीव ब्रह्म के भेदाभेद संबंधी विचार का निर्णय कर रहे हैं ~
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रज्जब जीव ब्रह्म अंतर इता, जिता जिता अज्ञान ।
है नाँहिं निर्णय भया, परदे का परमान१ ॥१॥
जिन जीवों में जितना अज्ञान है उतना उतना ही ब्रह्म ही उनसे दूर है, वास्तव में कोई भेद नहीं है । यह शास्त्र - संतों द्वारा भली प्रकार निर्यण हो चुका है, केवल अज्ञान रूप परदे से ही भेद भसता है, यही प्रामाणिक१ सिद्धान्त है ।
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जान जगत गुरु सजग है, अलग अजान अचेत ।
रज्जब नेड़े दूर का, समझ कह्या संकेत ॥२॥
ज्ञान द्वारा तो जगत - गुरु ब्रह्म जीव के साथ ही हैं और अज्ञान के द्वारा असावधान प्राणियों से अलग है, जो यह जीव से ब्रह्म के समीप और दूर होने का संकेत कथन किया है सो हमने सम्यक समझ करके ही कहा है ।
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पून्यों पूरा चांदणा, अमावस अंधियार ।
रज्जब समझ असमझ का, बाकी बिच व्यवहार ॥३॥
पूर्णिमा को चन्द्रमा का प्रकाश रात्रि भर पूर्ण रूप से रहता है और अमावस्या को अंधेरा सारी रात रहता है शेष अन्य दिनों में न्यूनाधिक रहता है, वैसे ही आत्मज्ञानी में ब्रह्म का पूर्ण प्रकाश रहता है, और अज्ञानी में सर्वथा नहीं रहता, शेष बीच के लोगों में उनकी बुद्धि के अनुसार ब्रह्म के ज्ञान अज्ञान का व्यवहार होता है, वे अपनी बुद्धि के अनुसार ही कथन करते रहते हैं ।
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शब्द न समझै आत्महिं, त्यों आतमाराम अगम्म ।
रज्जब कही विचार कर, नेति१ हि कहै निगम्म ॥४॥
शब्द जड़ होने से आत्मा को नहीं समझता, वैसे ही आत्मा राम ब्रह्म में भी शब्द की गति नहीं होती, यह हमने विचार करके ही कहा है, स्वयं वेद भी "यह नहीं१, यह नहीं" कह कर उक्त प्रकार ही निर्णय करता है ।
(क्रमशः)

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