शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

= ९६ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचै कोइ ।*
*वेद पुरान पुस्तक पढे, प्रेम बिना क्या होइ ॥*
=====================

छोटे बच्चे प्रेम कर सकते हैं, क्योंकि आश्चर्यचकित, विस्मय-विमुग्ध, अवाक !

छोटा बच्चा छोटी—छोटी चीजों के प्रेम में पड़ जाता है—समुद्र के किनारे रंगीन पत्थर बीनने लगता है; शंख—सीप बीनने लगता है। तुम ज्ञानी हो, तुम कहते हो फेंको इनको, कचरा कहां ले जा रहे हो ! बच्चे की समझ में नहीं आता कि इतना प्यार पत्थर, सूरज की रोशनी में ऐसे दमक रहा है हीरे जैसा ! ऐसा प्यार शंख ! वह बाप की नजर बचाकर खीसे में छिपा लेता है। उसे प्रेम उपजता है।
.
उसे हर चीज से प्रेम उपजता है। वह हर चीज के पास ठिठककर खड़ा हो जाता है। घास में फूल खिला है और वह ठिठककर खड़ा हो जाता है। वह भरोसा नहीं कर पाता ऐसा प्यारा फूल, ऐसा अदभुत रंग ! एक तितली उड़ी जा रही है, वह भरोसा नहीं कर पाता; वह भागने लगता है तितली के पीछे—ऐसा चमत्कार, जैसे फूल को पंख लग गए हों! हर चीज चमत्कृत करती है, उसे, क्योंकि वह कुछ भी नहीं जानता, अज्ञानी है, विस्मय से भरा है। आश्चर्य अभी उसका जीवित है।
.
फिर तुम धीरे—धीरे ज्ञान ठूसोगे, तुम हर चीज समझा दोगे। फिर एक दिन धीरे— धीरे जब वह विश्वविद्यालय से वापिस लौटेगा ज्ञानी होकर—सब गंवाकर और कोरे कागज साथ लेकर, सर्टिफिकेट लेकर—तब उसे कोई चीज विस्मय—विमुग्ध न करेगी। हर चीज का उत्तर उसके पास होगा। तुम पूछो—वृक्ष हरे क्यों है? वह कहेगा—क्लोरोफिल। बात खतम हो गयी। स्त्री सुंदर क्यों लगती है? हारमोन। बात खतम हो गयी। प्रेम क्या है? रसायनशास्त्र। वह समझा सकेगा सब। वह सब समझकर आ गया है। वह हर चीज को जानता है।
.
अब अनजाना कुछ छूटा नहीं है, प्रीति कैसे उमगे ! आश्चर्य ही मर गया। आश्चर्य की हवा में प्रीति उमगती है। इसलिए तुम जानकर आश्चर्य चकित मत होना कि जैसे—जैसे आदमी का ज्ञान बढ़ा है वैसे—वैसे दुनिया मे प्रेम कम हो गया। यह स्वाभाविक परिणाम है। यह शाडित्य के सूत्र में छिपा है : तयोपक्षयाच्च।
.
देखते नहीं, तुम रोज देखते नहीं—दुनिया मे जितनी शिक्षा बढ़ती जाती है, उतना प्रेम कम होता जाता है। शिक्षित आदमी और प्रेमी, जरा मुश्किल जोड़ है ! जितना शिक्षित, उतना ही कम प्रेमी। थोड़ा अशिक्षित होना चाहिए प्रेम के लिए। ग्रामीण के पास प्रेम है, शहरी के पास विदा हो गया। असभ्य के पास प्रेम है, सभ्य के पास नहीं।
.
जो जितना सुसंस्कृत हो गया है, उसके पास औपचारिकता है, लेकिन औपचारिकता में कहीं कोई प्राण नहीं, कहीं कोई जीवन नहीं। वह जब तुमसे पूछता है, कहिए कैसे? कुछ नहीं पूछ रहा है। वह यह कह रहा है कि चलो, आगे बढ़ो। यह तो पूछना पड़ता है। हमें मतलब? तुम्हें मतलब? किसी को क्या लेना—देना है।
.
वर्षो बीत जाते हैं और पड़ोसी से पहचान नहीं होती। सुसंस्कृत आदमी का कोई पड़ोसी ही नहीं है। पड़ोस तो प्रेम से बनता है। जीसस ने कहा है—कौन है पड़ोसी? क्योंकि जीसस बहुत जोर देते थे इस बात पर कि पड़ोसी से प्रेम करो, तो ही तुम परमात्मा से प्रेम कर पाओगे। अपने प्रेम को थोड़ा बढ़ाओ,फैलाओ सब तरफ; आस—पड़ोस प्रेम को फैलाओ। कौन है पड़ोसी? .
एक दिन उनके शिष्य ने पूछा कि आप किसको पड़ोसी कहते हैं? तो जीसस ने कहा—एक आदमी निकलता था एक सुनसान रास्ते से, डाकुओं ने हमला किया, उसे लूट लिया, उसको छुरे मारे। उसको कई घावों से भरकर पास के गड्डे में फेंक दिया।
.
फिर उसके गांव का ही पादरी वहा से गुजरा—रबाई—उसने देखा इस आदमी को, यह इसके गांव का ही आदमी था, इसके ही मंदिर में प्रार्थना करने आता था—यह मंदिर में ही प्रार्थना करने जा रहा था—इसने देखा—घाव से भरे, कराहते। उस आदमी ने कहा कि मुझे बचाओ; मैं मर रहा हूं; मुझे उठाओ।
.
लेकिन उसने कहा कि अगर मैं तुम्हें उठाऊं तो मैं झंझट में पडूगा; पुलिस पीछे पड़ेगी—क्या हुआ? कैसे हुआ? किसने मारा? तुम वहां क्या कर रहे थे?तुम्हारा कुछ हाथ तो नहीं है? फिर अभी मुझे मंदिर जाना है, मैं प्रार्थना करने जा रहा हूं। यह बेवक्त की झंझट कौन सिर ले ! मंदिर की जगह पुलिस— थाने जाना पड़े !
.
फिर इसको अस्पताल ले जाओ, फिर मर—मरा जाए, फिर न—मालूम कौन झंझट खड़ी हो। उसने तो पीठ फेर ली और चल पड़ा। फिर दूसरे गांव का एक आदमी पास से गुजर रहा था, जिसने इस आदमी को कभी देखा भी नहीं, वह पास आया, उसने इसे अपने गधे पर बिठाया, इसके घाव धोये, इसको पास की धर्मशाला में ले गया, वहा भोजन कराया, वहा इसे लिटाया चिकित्सक को बुलाया—और यह इस आदमी को जानता भी नहीं था।
.
तो जीसस ने पूछा अपने शिष्यों से—तुम किसको पड़ोसी कहते हो? वह पुरोहित पड़ोसी था, जो पड़ोस में ही रहता था, या यह अजनबी आदमी पड़ोसी है, जिसने इसे कभी देखा नहीं था? शिष्यों ने कहा—स्वभावत: यह अजनबी आदमी पड़ोसी है। तो जीसस ने कहा : जंहा प्रेम है, वहा पड़ोस है। जीता बड़ा प्रेम है,उतना पड़ोस है। अगर प्रेम बड़ा हो तो सारी पृथ्वी पड़ोस है। और प्रेम बड़ा हो तो सारा ब्रह्मांड पड़ोस है। प्रेम की सीमा पड़ोस की सीमा है। प्रेम यानी पड़ोस।
.
जैसे—जैसे शिक्षा बढ़ती है, ज्ञान बढ़ता है, प्रेम संकुचित होता जाता है। तयोपक्षयाच्च। इसलिए ज्ञान भक्ति मे सहयोगी तो होता ही नहीं, बाधा होता है।
और दूसरा अर्थ भी बहुमूल्य है— भक्ति से ज्ञान का क्षय हो जाता है। और जब भक्ति का जन्म होता है तो आदमी पुन: अज्ञानी हो जाता है; वह सब ज्ञान—व्यान को जलाकर फेंक देता है, राख कर देता है।
.
क्योंकि जब वह परमात्मा से थोड़ा सा जुड़ता है, तब उसे पता चलता है कि जो जाना सब कचरा था। वह तो सब झूठ था वह तो सब व्यर्थ था। अब असली हीरे मिले। तो वह जो उसने कंकड़—पत्थर बीन रखे थे, फेंक देता है। जो उसने शास्त्रों का उच्छिष्ट इकट्ठा कर लिया था, अब क्यों करे !
.
अब तो अपने ही शास्त्र का जन्म हो गया है। अब तो उपनिषद अपने भीतर ही उतर रहा है। अब क्यों किसी उपनिषद को बांधे फिरे। अब क्यों किसी कुरान की आयत को दोहराए ! अपनी ही आयत गर्भ में आ गयी है, पक रही है। अपने ही फल पकने लगे, अपने ही फूल खिलने लगे।
.
तो जैसे ही भक्ति का जन्म होता है, ज्ञान का क्षय हो जाता है। भक्ति और ज्ञान ऐसे हैं जैसे रोशनी और अंधेरा। रोशनी है तो अंधेरा नहीं। अंधेरा है तो रोशनी नहीं। दोनों साथ नहीं होते हैं।
.
ज्ञानी भक्त नहीं होता—ज्ञानी यानी पंडित, खयाल रखना—और भक्त ज्ञानी नहीं होता। भक्त तो निर्दोष हो जाता है, समस्त ज्ञान से मुका हो जाता है। भक्त तो पुन: अज्ञानी हो जाता है। क्योंकि परमात्मा अज्ञेय है; उसके सामने हम अज्ञानी की तरह ही खड़े हो सकते हैं, इतनी की तरह नहीं। ज्ञान का दावा अहंकार का दावा है।
.
इस सूत्र को खूब हृदय में सम्हालकर रखना, यह कुंजी है : —तयोपक्षयाच्च। क्योंकि पूर्णरूप से भक्ति उदय होते ही ज्ञान का नाश हो जाता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें