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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= फुटकर काव्य १.चौबोला - ५.६ =*
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*सूंठिक चूकौं तूं धनी पी परिहरि किम जाइ ।*
*अज मौ इनि दीधौ बिरह बचन सँभालौ आइ ॥५॥*
५. सूं ठिक चुकौ : हे भगवन् ! आप अब भी क्यों भूल रहे हो ! हे प्रिय ! आप हम दीन हीन लोगों को छोड़कर क्यों जा रहे हो । अब तो आप हमको दिये हुए अपने वचनों की रक्षा कर लें ॥
दूसरा अर्थ : सूंठ : शुण्ठी(एक औषध) । चूका : एक खट्टा शाक । पीपल = एक औषध । अजमौद = एक औषध । संभालौ = एक वातनाशक औषध । धनी = धनियां ॥
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*चंपा कदे न पाव मैं जूही तिहारैं हेज ।*
*जाही बिधि तुम अब कहौ जाइ बिछाऊं सेज ॥६॥*
हे भगवान् ! आज तक मैंने आपके चरण प्रेम से कभी नहीं दबाये । परन्तु अब आप जैसी आज्ञा दें वैसा ही करूँ । अब आप जो कहेंगे वही करूँगा । आपकी शय्या प्रेम से बिछाऊँगा ॥
दूसरे अर्थ में : चंपा तथा जूही का अर्थ एक फूलवाला वृक्ष होगा । अर्थात् आपके प्रेम में मैंने कभी चंपा या जूही के फूल नहीं बिछाये । अब आपकी आज्ञानुसार बिछाऊँगा ॥६॥
(क्रमशः)

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