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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= फुटकर काव्य २.गूढार्थ - ९/१० =*
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*अर्क हि त्यागै जानि कैं चन्दन जाकै पास ।*
*ता राजा कै संग है नभ मैं कियौ निवास ॥९॥*
जिसके द्वार पर चन्दन वृक्ष खड़ा है वह अर्क वृक्ष की अपेक्षा क्या करेगा । जो भगवान् के भजन में लीन हो गया वह अर्कवृक्ष तुल्य कटु विषयरस की क्यों अपेक्षा करेगा ! अतएव जिसने गगनमण्डल(शून्य लोक) में समाधि लगा ली वह साधारण लौकिक विषयवासना की क्या अपेक्षा करेगा ।
इस दोहा के ‘अर्क’, ‘चन्द’ ‘तारा’ एवं ‘नभ’ शब्दों की उपस्थिति इसे इसका अन्य अर्थ भी हो सकता है ॥९॥
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*अग्नि बाण करि चौगुनें लक्षण एकहू नांहिं ।*
*अनुड्वान सो जांनिये संमुझि देषि मन मांहिं ॥१०॥*
लोक में साधारण ‘अग्नि’ एक ही मानी जाती है । ‘वाण’ पाँच होते हैं । इन एक और पाँच का संकलन छह(६) होता है । इस छह(६) को चौगुना कर देने से २४(चौबीस) हो जाता है । मनुष्य के चौबीस सद्गुण माने जाते हैं । “इन चौबीस सद्गुणों में से एक भी सद्गुण जिसमें न हो वह मनुष्य नहीं. अनड्वान (बैल = मुर्ख पशु) कहा जाता है” – इस बात को अपने मन में भली भाँति समझ लो ॥१०॥
(क्रमशः)

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