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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*भ्रम विध्वंस*
*दादू यहु मसीति यहु देहुरा, सतगुरु दिया दिखाइ ।*
*भीतर सेवा बंदगी, बाहर काहे जाइ ॥७५॥*
इस पद्य में उन अतिमूढ मनुष्यों के भ्रम को दूर किया है जो केवल मन्दिर-मस्जिद में ही भगवान् मानते हैं । श्रीदादूजी महाराज ईश्वर को सर्वत्र ही विराजमान मानते हैं; क्योंकि श्रुति में भी ईश्वर को आकाशवत् सर्वव्यापक बताया है । अतः हे पुरुषो ! स्वशरीर में ही अवस्थात्रय के साक्षी आत्मा का ध्यान कर के सुखी हो जाओ ! बाहर जगत् में व्यर्थ ही क्यों भटक रहे हो । लिखा है-
“यह देह ही देवालय है, इस में जो जीव है वही शिव है । अतः अज्ञानरूपी निर्माल्य को त्याग कर सोऽहं भाव से भगवान् का पूजन करो । चेतनस्वरूप सर्वव्यापक नित्य परिपूर्ण सुखमय द्वेतरहित साक्षात् ब्रह्म ही सब कुछ है और कुछ है ही नहीं । ब्रह्मज्ञानियों की यही स्थिति हुआ करती है” ॥७५॥
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*कस्तूरिया मृग*
*दादू मंझे चेला मंझि गुरु, मंझे ही उपदेश ।*
*बाहर ढूढैं बावरे, जटा बधाये केश ॥७६॥*
सात्त्विक श्रद्धा युक्त मन ही शिष्य है । ज्ञानयुक्त मन ही गुरु है । विचार ही उपदेश है । आत्मस्वरूप ब्रह्म उपास्य है । ये सभी अन्दर ही हैं । फिर भी अज्ञानी शिष्य जटाधारी और मुण्डी हो कर तृणसदृश तुच्छ विषयों में कस्तूरी मृग की तरह उस आत्मानन्द को खोजता है । परन्तु वह ब्रह्मा की आयुपर्यन्त खोजने पर भी उसे वहाँ मिल नहीं सकता । महाभारत में लिखा है-
“हे महाबाहो ! आत्मा को ही गुरु समझो और मन को शिष्य समझो” । और आत्मोपनिषद् में लिखा है-
तत्वदर्शी ज्ञानियों को गुरु शिष्यादिभेद से जो कुछ भास् रहा है वह केवल शुद्ध ब्रह्म ही है ॥७६॥
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*मन का दमन*
*मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश ।*
*दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥७७॥*
अपने मन को जीते विना काम क्रोध परायण रहते हुए तथा जो विषय लम्पट है वे दूसरों को अपना शिष्य बनाकर तथा आप स्वयं गुरु बनकर उपदेश देते हैं, उनके प्रति शिक्षा देते हैं-
हे मानवो ! आप लोग गुरु होने योग्य नहीं हैं । क्योंकि आप लोग अध्यात्म ज्ञान शून्य हैं । तथा स्वयं पाप कर्मपरायण होने के कारण शिष्य के अज्ञान को कैसे दूर कर सकते हैं? अतः पहले आप लोग अपने मन को विषयों से हटाकर काम-क्रोध से विनिर्मुक्त हो जाओ, फिर दूसरों को ज्ञान देना । लिखा है-
ज्ञानहीन तथा मिथ्यावादी एवं निन्दक गुरु को त्याग दो; क्योंकि वह स्वयं अशान्त है, तो फिर वह दूसरों को कैसे शान्ति प्रदान कर सकता है ! ॥७७॥
(क्रमशः)

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