शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

= *उनमानी का अंग ८७(५/८)* =

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*अपणी जाणै आप गति, और न जाणै कोइ ।*
*सुमरि सुमरि रस पीजिये, दादू आनन्द होइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*उनमानी का अंग ८७* 
कीड़ी कुंजर१ अनल का, एक नहीं उनमान२ । 
बोझ उठावै बल यथा, समझो संत सुजान ॥५॥ 
चींटी, हाथी१ और अनल पक्षी के बल का अंदाज२ एक सा नहीं है, इन तीनों में से जिसमें जैसा बल है, वह उतना ही बोझ उठाता है, वैसे ही हे सुजान ! संतों को समझो, वे भी अपनी शक्ति के अनुसार ही भजन करते हैं । 
ऐको जानी गहन गति, एकौ मिलै सु आय । 
इक राहु केतु ज्यों मिल गये, शशि सूरज निरताय ॥६॥ 
योग्यता का विचार करो तो ज्ञात होगा, योग्यता सब में समान नहीं होती, एक तो ग्रहण होने की चेष्टा को वा गंभीर गति को पहले ही जान लेता है, एक हीरा जड़ होते हुये भी हीरी को अन्य स्थान ले जाने पर अपने आप ही हीरे से जा मिलता है । एक राहु - केतु जैसे चन्द्र - सूर्य को निगल जाते हैं, वैसे ही दूसरों को खा जाते हैं जैसे मच्छरादि को मेंढक आदि खाते हैं । 
कीड़ी कण१ अवनि२ अहि३ माथे, 
बल उनमान उठावहि बोझ । 
त्यों ही भाव भक्ति भगत जन, 
जन रज्जब पाया निज सोझ४ ॥७॥ 
चींटी तो एक दाना१ उठाती है और शेषजी३ ने पृथ्वी२ को शिर पर उठा रक्खा है, सभी अपने बल के समान बोझ उठाते हैं, वैसे ही भक्तजन अपनी शक्ति के अनुसार ही भाव-भक्ति करते हैं । यही निज प्रभु को प्राप्त करने के लिये संतों का सुझाव४ है कि शक्ति के अनुसार साधन करते रहें, सो हमने जान लिया है । 
उनमान चल्यों दीसै भला, बिन उनमान खराब । 
रज्जब कही विचार कर, बहुरि बडहुं का ज्वाब१ ॥८॥ 
अपनी शक्ति के अनुसार चलने से तो भला ही होता दिखाई देता है और अपने अधिकार से बाहर का कार्य करने से खराबी ही होती है । हमने यह विचार करके ही कहा है और बड़े पुरुषों का भी यही उत्तर१ है कि शक्ति के अनुसार ही काम करो । 
(क्रमशः)

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