🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह ।*
*दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥*
===========================
खयाल रखें, जब कहा जाता है स्त्रैण, तो स्त्री से मतलब नहीं है। और पुरुष तो पुरुष से मतलब नहीं है। पुरुष चित्त से अर्थ है, जो समर्पण करने में असमर्थ है। स्त्री से अर्थ है जो समर्पण के बिना जी ही नहीं सकती। स्त्री तो ऐसे ही है जैसे लता—वृक्ष पर छा जाती है; पूरे वृक्ष को घेर लेती है—लेकिन वृक्ष के सहारे।
.
किसी वृक्ष को लता के सहारे देखा? कोई वृक्ष लता के सहारे नहीं होता। लता वृक्ष के सहारे होती है। वृक्ष धन्यभागी हो जाता है, लता उसे घेर लेती है तो—प्रफुल्लित होता है, आनंदित होता है। किसी ने उसे घेरा अपनी बाहों में, प्रफुल्लित क्यों न हो !
.
लेकिन लता सहारे होती है। वृक्ष अपने सहारे होता है। पुरुष चित्त का लक्षण है अपने सहारे होना। इसलिए पुरुष चित्त ने जो धर्म पैदा किये हैं उन धर्मों में साक्षी पर जोर है—सिर्फ जाग जाओ ! कृष्णमूर्ति जिस धर्म की बात कर रहे हैं वह पुरुष चित्त का धर्म है—सिर्फ जाग जाओ। कुछ और नहीं। होश से अपने भीतर केंद्रित हो कर खड़े हो जाओ।
.
अष्टावक्र कहते हैं : स्वस्थ हो जाओ, स्वयं में स्थित हो जाओ। कहीं जाना नहीं। कहीं झुकना नहीं। कोई मंदिर नहीं, कोई मूर्ति नहीं, कोई पूजा नहीं, कोई प्रार्थना नहीं। लेकिन यह बात स्त्री चित्त को तो बड़ी बेबूझ मालूम पड़ेगी। यह तो धार्मिक ही न मालूम पड़ेगी। स्त्री चित्त को तो इसमें कुछ रस आता मालूम न पड़ेगा।
.
स्त्री तो मीरा की तरह नाचना चाहेगी। स्त्री तो लता है, तो कृष्ण के वृक्ष पर छा जाना चाहेगी। वह तो किसी के सहारे डूब जाना चाहेगी। तो स्त्री चित्त के लिए अलग भाषा है। स्त्री के प्यार से ही उठती है प्रार्थना। स्त्री के प्यार से ही उठती है पूजा। स्त्री की प्यार की ही सघनीभूत स्थिति है परमात्मा।
.
इन दोनों में ये नहीं कहा जा रहा है कि इसको चुनो और इसको छोड़ो। इतना ही कहा जा रहा है कि जो रुचिकर लगे, जो मन भावे, जो रुचे, जो स्वादिष्ट मालूम हो, उसमें डूब जावें। अगर स्त्री—शरीर में हो तो इस कारण यह न सोचें कि भक्ति में ही डूबना है। जरूरी नहीं है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें