बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

= सुन्दर पदावली(फुटकर काव्य २.गूढार्थ - ७/८) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= फुटकर काव्य २.गूढार्थ - ७/८ =* 
*गो पर गो चारत फिर्यौ गोरस षोयौ मन्द ।* 
*गोरषनाद न ह्वै सक्यौ गोबिन्द गह्यौ न चन्द ॥७॥* 
सप्तम छन्द : तूँ इन्द्रिय विषयों में ही विचरण करता रहा वास्तविक भजनानन्द नहीं ले सका(तूँ गौएँ ही चराता फिरा, उनका दूध नहीं पी सका । तूँ वास्तविक गोपालन का सुख नहीं भोग सका । इसलिए तूँ गोरक्षनाथ नहीं कहलाया । परिणामस्वरूप न तुझे गोविन्द ही मिले, न सांसारिक सुख ही ।
तूँ गौ रखकर भी उनका गोपाल(भगवद्भक्त) नहीं बन सका । इन्द्रियों के स्वामी मन को वश में न कर उसको परमात्मा के चरणों में लीन न कर सका ॥७॥ 
*बार बार गणिबौ कियौ बार गई सब बीति ।* 
*बार बार क्यौं फिरत है बार बार मन जीति ॥८॥* 
तूँ ने सांसारिक विषयों में आसक्त होकर, धन कमाकर, मुद्राओं को ही बार बार गिनता रहा । वह ‘बार बार’ भी बीत गयी । अब भी तूँ क्यों बार बार इस संसार में आना जाना कर रहा है । अब तो तूँ इस ‘बार बार’ को अपने मन के विजय में लगा दे । 
द्रव्य को बार-बार मुद्राओं में गिनते हुए तेरी आयु बीत गयी । अब भी वार वार(घर घर, द्वार द्वार या मतमतान्तरों में) भटकता क्यों फिर रहा है ? अब तो तूँ अपने मन को बाह्य वृति से निकालकर, अन्तर्मुख कर, उसे भगवद्भजन में लगा दे ॥८॥
(क्रमशः)

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