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*अमृत भोजन राम रस, काहे न विलसै खाइ ।*
*काल विचारा क्या करै, रम रम राम समाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सजीवन का अंग ८५*
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श्रवण द्वार ह्वै दुर्ग१ दिल, चढै शब्द सामन्त२ ।
रज्जब रिपु मारे सु मध्य, बाहर विघ्न न जंत३ ॥२९॥
श्रवण रूप द्वार से हृदय रूप किले१ पर गुरु-शब्द रूप योद्धा२ चढाई करता है और हृदय के मध्य ही कामादि शत्रुओं को मार डालता है फिर साधक जीव३ को बाहर से कोई भी विघ्न नहीं सताता ।
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रज्जब साधू जोध१ मत२, जे बैठै३ जीव माँहिं ।
सो निर्भय नौ खण्ड में, पिशुन४ सु गंजै५ नाँहिं ॥३०॥
संतों का सिद्धान्त२ रूप योद्धा१ जिस जीव के हृदय में स्थित३ हो जाता है, वह जीव नौऔं खण्ड में निर्भय रहता है, उसे काल रूप दुष्ट४ नष्ट५ नहीं कर सकता ।
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साधु शब्द अमृत अचै१, अमर होत आतम्म ।
पीवै प्राणी पीयूष यहु, जीव न लागै जम्म ॥३१॥
जो जीवात्मा संत के ज्ञान पूर्ण शब्द रूप अमृत का श्रवण रूप पान१ करता है, वह अमर हो जाता है । जो प्राणी इस अमृत का पान करता है उस जीव के पीछे यम नहीं लगता ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित सजीवन का अंग ८५ समाप्तः ॥सा. २७४४॥
(क्रमशः)

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