सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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६७ - परिचय हैरान । नटताल
ऐसो खेल बन्यो मेरी माई, 
कैसे कहूँ कछु जान्यो न जाई ॥टेक॥
सुर नर मुनिजन अचरज आई, 
राम - चरण को भेद न पाई ॥१॥
मन्दिर माँहीं सुरति समाई,
कोऊ है सो देहु दिखाई ॥२॥
मनहिं विचार करहु ल्यौ लाई, 
दिया समान कहं ज्योति छिपाई॥३॥
देह निरँतर शून्य१ ल्यौ लाई, 
तहं कौण रमे२ कौण सूता रे भाई ॥४॥
दादू न जाणे ये चतुराई, 
सोइ गुरु मेरा जिन सुधि पाई ॥५॥
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ब्रह्म - साक्षात्कार का आश्चर्य प्रकट कर रहे हैं - हे भाई ! मेरी अनुभूति में राम के साक्षात्कार का ऐसा खेल बना हुआ है जिसे कहूं भी कैसे ? कारण, वाणी से कहने का तो कुछ उपाय भी नहीं जानने में आता । 
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देवता, साधक, नर, मुनिजनादि को राम के चरणों का दर्शन करके आश्चर्य ही होता है । राम के वास्तविक स्वरूप के आदि, मध्य, अन्त का रहस्य प्राप्त नहीं होता । 
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हृदय मंदिर में स्थित साक्षी चेतन में जब वृत्ति लय होती है तब जो कोई सत्य तत्व है, वही दिखाई देता है । मन के द्वारा साक्षी चेतन के स्वरूप का सम्यक् विचार करो, फिर वृत्ति साक्षी चेतन में लगाओ । 
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वृत्ति सम्यक् अन्तर्मुख होकर लगने पर आत्मा का साक्षात्कार अवश्य होगा । क्योंकि, वह दीपक ज्योति के समान भासने वाली आत्म ज्योति कहां छिप जायेगी ? 
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देह में अन्त:करण के भीतर निरन्तर शुद्ध१ चेतन में वृत्ति लगाई जाती है, तब हे भाई ! कौन विचरता२ हुआ और कौन सोता हुआ दिखाई देता है ? अर्थात् विचरना आदि तो शरीर के धर्म हैं, वहां शरीर नहीं भासता । 
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हम तो जो परब्रह्म के स्वरूप सम्बन्धी विलक्षणतायें हैं, उनका आदि अन्त भी नहीं जान पाते । परब्रह्म के स्वरूप की विलक्षणताओं को परब्रह्म ही जानते हैं और वे ही दादूजी के गुरु हैं । 
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अहमदाबाद में काँकरिये तालाब पर भगवान् ने वृद्ध - स्वरूप बनाकर बचपन में दादूजी को उपदेश दिया था । यह भजन ठट्ठा नगर से आई हुई माता को सँबोधन करके सत्संग में कहा गया था । चतुर्थ पाद में भाई ! भी आया है । जो पास बैठे हुये अन्य सँत को कहा है, ऐसा ज्ञात होता है ।
(क्रमशः)

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