🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*जहँ आतम राम संभालिये, तहँ दूजा नांही और ।*
*देही आगे अगम है, दादू सूक्ष्म ठौर ॥*
===================
साभार ~ Atul Verma
छोटी—छोटी चीजों की भी हम परिभाषा नहीं कर पाते। लेकिन परमात्मा की हम परिभाषा पूछते हैं कि परमात्मा क्या है? पीला रंग क्या है, इसकी परिभाषा नहीं खोजी जा पाती। शुभ क्या है, पता नहीं चलता। सौंदर्य क्या है, पता नहीं चलता। पूछते हैं, परमात्मा क्या है?
.
ये सब जो इनडिफाइनेबल्स हैं, ये जो सब अपरिभाष्य हैं, दि टोटेलिटी आफ आल इनडिफाइनेबल्स इज गॉड। यह जो सब अपरिभाष्य है, इन सबका जो जोड़ है, वही ईश्वर है।
.
इसलिए बुद्ध तो किसी गांव में जाते थे, तो उनका एक शिष्य गांव में घंटा बजाकर खबर कर आता था कि बुद्ध ने ग्यारह प्रश्न तय किए हैं, कोई पूछे न। ईश्वर क्या है, यह पूछे न। ग्यारह प्रश्नों में जितने भी अपरिभाष्य हैं, वे सब बुद्ध ने तय कर रखे थे। वे कहते थे, इनको छोडकर कुछ भी पूछो। ये पूछो ही मत।
.
अनेक लोग उनसे पूछते कि यही तो पूछने योग्य मालूम पड़ते हैं और आप इन्हीं पर रोक लगा देते हैं! फिर पूछने को कुछ बचता नहीं ! ईश्वर मत पूछो, आत्मा मत पूछो, मोक्ष मत पूछो, यह कुछ पूछो ही मत। इन ग्यारह में, आपके सारे दार्शनिक सवालों को बुद्ध अलग कर देते थे। तो हम क्या पूछें?
.
तो बुद्ध कहते थे, बेहतर हो कि तुम पूछो कि ईश्वर कैसे पाया जा सकता है ! पूछो कि ईश्वर कैसे जाना जा सकता है ! पूछो कि ईश्वर कैसे हुआ जा सकता है ! यह मत पूछो कि ईश्वर क्या है !
.
इसका मतलब आप समझे? ईश्वर की हम व्याख्या नहीं कर सकते, लेकिन अनुभव कर सकते हैं। सौंदर्य की हम व्याख्या नहीं कर सकते, अनुभव हम रोज करते हैं। फूल खिलता है और हम कहते हैं, सुंदर है। और छोटा—सा बच्चा भी पूछ ले कि सौंदर्य यानि क्या? क्या मतलब सौंदर्य से? कहां है सौंदर्य इस फूल में, मुझे बताओ ! हाथ रखकर, अंगुली रख दो कि यह रहा सौंदर्य।
.
आप पंखुड़ी पर अंगुली रखेंगे, तो लगेगा, यह भी कोई सौंदर्य हुआ ! आप पूरे फूल को भी मुट्ठी में ले लेंगे, तो भी क्या आप समझते हैं, आपने सौंदर्य को मुट्ठी में ले लिया ! आप कहां से बताएंगे कि सौंदर्य यह रहा ! आप उस बच्चे को कहेंगे, सौंदर्य एक अनुभव है। हो तो हो, न हो तो न हो।
.
और फूल से सौंदर्य का कुछ लेना—देना नहीं है। क्योंकि कल सुबह आप कहेंगे, बड़ा सुंदर सूरज निकल रहा है। बच्चा पूछेगा कि फूल में और सूरज में कोई संबंध तो मालूम नहीं होता ! कल फूल को सुंदर कहते थे, आज सूरज को सुंदर कहने लगे ! कुछ तो समझ का उपयोग करो ! और परसों आप कहेंगे किन्हीं आंखों में देखकर कि आंखें बड़ी सुंदर हैं। तो वह बच्चा कहेगा, अब आप बिलकुल पागल हुए जा रहे हैं। परसों फूल को कहा था सौंदर्य। कल सूरज को कहा था सौंदर्य। आज आंखों को कहने लगे सुंदर हैं ! सौंदर्य क्या है?
.
अगर इन तीनों में है, तो इसका मतलब हुआ कि फूल से वह समाप्त नहीं होता। सूरज पर समाप्त नहीं होता। आंखों में समाप्त नहीं होता। अगर इन तीनों में है, तो तीनों जैसा नहीं है और फिर भी तीनों के भीतर कहीं छिपा है। तीनों में अनुभव होता है और हृदय एक—सा आंदोलित होता है। लेकिन कहां फूल और कहां सूरज और कहां आदमी की आंखें ! इनमें कोई संबंध दिखाई नहीं पड़ता। कोई अदृश्य फूल में भी मौजूद है, जिसे आप सौंदर्य कहते हैं। कोई अदृश्य आंख में भी मौजूद है, जिसे आप सौंदर्य कहते हैं।
.
गीता दर्शन भाग–5,
अध्याय—10, OSHO

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें