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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= फुटकर काव्य १.चौबोला - १५.१६ =*
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*काशी लागा बहुत ही गया और ही बाट ।*
*अजो ध्यान अब करत हौं तिरबेनी के घाट ॥१५॥*
उस प्रभु की प्राप्ति के भ्रम में बहुत समय तक काशी में तेरा मन लगा रहा । पुनः कुछ दिन अन्य अयोध्या आदि तीर्थों में भी घूमता रहा । पुनः इसी भ्रम में तूं ने कुछ समय गया तीर्थ में बिताया । अब(वर्तमान में) तेरा ध्यान प्रयाग तीर्थ के त्रिवेणी घाट पर लगा हुआ है ॥१५॥ (इस पद में चार तीर्थों का नाम है – काशी, गया, अयोध्या एवं त्रिवेणी(प्रयाग) तीर्थ ॥)
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*कुरुषेत कौनि दान तूं हरिद्वार तब जाइ ।*
*बदरी तासौं क्यौं रहै सुर सरीर मैं न्हाइ ॥१६॥*
अरे मुर्ख ! तूं पहले अपने खेत(काया) को शुद्ध कर ले । तब हरद्वार आदि तीर्थ(या भगवान् के द्वार) जाने की बात सोचना । अर्थात् तूँ पहले अपनी काया को उत्तम कर्मों द्वारा शुद्ध करके ही हरि(परमात्मा) के द्वार तक पहुँच पायगा । तूँ अपने उस प्रियतम ब्रह्म से मानव तन पाकर भी बदला बदला सा क्यों रहता है ? पहले तूँ अपनी इडा पिंगला आदि नाडियों का शोधन कर ॥१६॥ (इस पद में चार नाम निकलते हैं – कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, बदरीनाथ, सुरसरी(गंगा)
(क्रमशः)

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