बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

= सुन्दर पदावली(फुटकर काव्य १.चौबोला - १) =

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= फुटकर काव्य १.चौबोला - १ =*
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*दोहा* 
*पीपरदेसैं गवन करि बरबट गये रिसाइ ।* 
*परासषी मो रोवना साल रिदै नहिं जाइ ॥१॥* 
आगे वर्णित सभी दोहे द्वयर्थक हैं; क्योंकि इनमें प्रयुक्त अनेक शब्द श्लेषार्थक हैं । इनमें..
(क) कहीं शब्दों को विभक्त करने से, 
(ख) कहीं यतिभंग से, तो
(ग) कहीं शब्द में अल्पाधिक परिवर्तन करने से प्रत्येक दोहा अनेकार्थक हो गया है । अतः हम भी सर्वप्रथम उसका वाच्य अर्थ लिखेंगे । तदन्तर उसके श्लेषार्थ का संकेत करेंगे । 
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*पी परदेसैं गवन करि* : 
(क)हे सखि ! मेरे प्रिय पतिदेव, परदेस गये थे । वहाँ जाकर, वहीं के होकर रह गये । ऐसा ज्ञात होता है कि प्रिय सखि ! वे मुझसे अप्रसन्न हो गये हैं, इसीलिये वे हम सब से बोल नहीं रहे हैं । इसी पर मुझे रोना आता है । यही बात मेरे हृदय को कष्ट दे रही है ॥ 
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(ख)मेरे पति पीपलदा ग्राम से चलकर वट वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गये । हे सखि ! ऐसा ज्ञात होता है कि वे मुझसे अप्रसन्न हैं; इसीलिये मुझको रोना आ रहा है । यह कष्ट हृदय से निकल नहीं रहा है ॥ 
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(ग)इस दोहे में – पीपर दे, वरबट, परास मोरो एवं सालरिदै – ये चार शब्द किन्हीं स्थानीय ग्रामों के नाम के भी बोधक हैं ।(ये चारों ग्राम ही राजस्थान में जयपुर जिले के अन्तर्गत हैं ।)
(क्रमशः)

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