गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग. ९/१३


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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*राम नाम उपदेश कर, अगम गवन यहु सैन ।* 
*दादू सतगुरु सब दिया, आप मिलाये ऐन ॥९॥* 
इन्द्रियों का अविषय एवं मन से भी दुर्विग्राह्य जो ब्रह्म है, उसकी प्राप्ति के लिये मेरे गुरु ने मुझे रामनाम का उपदेश किया है जिससे मुझे ब्रह्म का साक्षात्कार हो गया । लिखा है- “इस कलिकाल में रामनाम से अधिक परमात्मा की प्राप्ति का साधन दूसरा नहीं है । हरि नाम का मन्त्र देकर मेरे गुरु ने मुझे सब कुछ दे दिया” ॥९॥ 
*सत गुरु किया फेरि कर, मन का औरै रूप ।* 
*दादू पंचों पलटि कर, कैसे भये अनूप ॥१०॥* 
अहो ! मुझ पर गुरु की महती अनुकम्पा हुई कि जिससे मेरी इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि काम क्रोध का त्याग कर सर्वगत सर्वाधिष्ठान ब्रह्म को ही देखती हैं ॥१०॥ 
*साचा सतगुरु जे मिलै, सब साज संवारै ।* 
*दादू नाव चढ़ाय कर, ले पार उतारै ॥११॥* 
सौभाग्यवश यदि ब्रह्मनिष्ठ गुरु की प्राप्ति हो जाय तो वह ज्ञानप्राप्ति के समग्र साधनों को संशोधन कर ऐसा संवार देते हैं कि द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति हो जाय । वे अपने शिष्य को ज्ञान की नौका में बैठा कर स्वयं कर्णधार बन जाते हैं और उसे संसारसागर से पार करा देते हैं । 
बोधसागर में लिखा है- “हे गुरुदेव ! हम तारने योग्य आपके शिष्य हैं, ज्ञानरुपी नौका आपके पास है । पार करने योग्य यह संसारसागर है । आप पार कराने वाले कर्णधार हैं । अतः हम आपकी शरण में आये हैं । हम आपको प्रणाम करते हैं” ॥११॥ 
*सतगुरु पसु मानस करै, मानस थैं सिध सोइ ।* 
*दादू सिध थैं देवता, देव निरंजन होइ ॥१२॥* 
“संसार में रहने वाले ब्रह्म से लेकर स्थावर पर्यन्त भगवान् शंकर के पशु कहलाते हैं । उन सब के स्वामी होने से शंकर ‘पशुपति’ कहलाते हैं । मायादिपाशों से शंकर सभी को बांधते हैं और उनकी भक्ति करने वालों को पाश्मुक्त कर देते हैं । पाशों से बांधकर अपना कार्य करवाते हैं ।” 
अतः सर्वधर्मबहिष्कृत विषयासक्त प्राणियों को गुरु मानवधर्मयुक्त कर देते हैं और मानवधर्म, विद्या, दया, दान, परोपकार, विश्वास, श्रद्धा, शील, जितेन्द्रियत्व, निर्लोभता, निर्मोहता, भक्ति, हरि-गुरु-सेवा इत्यादि होते हैं । इनसे युक्त मनुष्य धर्माचरण द्वारा सिद्ध हो जाते हैं । इसके बाद साधना करते-करते वे ही मनुष्य देवता कोटि में पहुँच जाते हैं । तथा एक दिन ऐसा आता है कि वे उसी साधना के द्वारा ब्रह्मभाव को प्राप्त कर लेते हैं ॥१२॥ 
*दादू काढे काल मुखि, अंधे लोचन देइ ।* 
*दादू ऐसा गुरु मिल्या, जीव ब्रह्म कर लेइ ॥१३॥* 
काम ही कालरूप है । वह सभी स्त्री-पुरुषों को परस्पर मोहबद्ध करके खाता है । 
गीता में लिखा है- “यह काम ज्ञानियों का नित्य वैरी है तथा अग्नि की तरह दुष्पूर है । यह ज्ञान को नष्ट करने वाला है ।” 
सद्गुरु कामान्ध पुरुषों को वैराग्य का उपदेश देकर ज्ञान द्वारा मोह-शृंखला को तोड़कर उनका उद्धार करते हैं । अन्ततः वे ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाते हैं । 
गीता में लिखा है- ‘कामनाओं के भोग से कभी काम की निवृत्ति नहीं होती; प्रत्युत जैसे अग्नि में घृत डालने से अग्नि बढ़ती ही है, वैसे ही काम के उपभोग से कामना बढ़ती है । अतः हे अर्जुन ! इस कामरूपी शत्रु को मार डाल । इस ज्ञानविज्ञाननाशक पापमय दुर्गुण का सर्वथा त्याग कर दे’ ॥१३॥(क्रमशः)

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