सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

= *निष्पक्ष मध्य का अंग ८८(१/४)* =

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*दादू पखा पखी संसार सब, निर्पख विरला कोइ ।*
*सोई निर्पख होइगा, जाके नाम निरंजन होइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*निष्पक्ष मध्य का अंग ८८*
इस अंग में पक्ष रहित मध्य मार्ग विषयक विचार कर रहे हैं ~
रज्जब तामा लोह पख, पारस है प्रभु नाम । 
परसे से कंचन भये, यहु निर्पख निज ठाम ॥१॥ 
पक्ष वाले तामा और लोह के समान है, प्रभु का नाम पक्ष रहित पारस के समान है, जैसे पारस का स्पर्श करने पर तामा और लोह दोनों ही पारस सोना बना देता है, वैसे ही प्रभु का नाम सबको पवित्र करता है । 
फक्कर जाति खुदाय की, उभय न रीति रु वेश । 
रज्जब अल्लह ज्यों रहै, सो सच्चा दरवेश ॥२॥ 
संत ईश्वर की जाति का होता है, उसमें पक्ष-विपक्ष रूप दोनों रीति तथा भेष का आग्रह नहीं होता । जो ईश्वर के समान निष्पक्ष रहता है, वही सच्चा संत है । 
ब्रह्म जाणे सो ब्राह्मण, सौदे१ सैयद होय । 
रज्जब राखी बडहुने, फेर सार नहिं कोय ॥३॥ 
ब्रह्म को जानता है, वह ब्राह्मण होता है और ब्रह्म से प्रेम१ करता है, वह सैयद होता है । बड़े पुरुषों ने दोनों संज्ञा उक्त अर्थ को ध्यान में रख कर के ही रक्खी है, इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं है, यह सार बात है । 
ब्रह्म वणिज१ जिव ब्राह्मण, सौदै२ सैयद होत । 
वेद कुराणों में कही, छूटै३ गाफिल४ गोत५ ॥४॥ 
ब्रह्म चिन्तन रूप व्यापार१ करता है, वही जीव ब्राह्मण होता है और ब्रह्म से प्रेम२ करता है, वही सैयद होता है । यही वेद व कुरान में कहा है, जो ब्रह्म के अभेद चिन्तन और प्रेम से अलग३ रहता है वह जाति-गोत्र४ अचेत५ है । 
(क्रमशः)

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