सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

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*काया कठिन कमान है, खांचै विरला कोइ ।*
*मारै पंचों मृगला, दादू शूरा सोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ शूरातन का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *तप* 
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सूर्य के अर्ध्य प्रदान करते समय गालव ऋषि की अंजली मे गन्धर्वराज चित्ररथ ने पान का पीक थूक दिया । गालव ने उसे एक ओर डालकर शुद्ध जल भरा । उसने फिर थूका, ऐसे ही तीन बार किया। इससे गालब ने श्रीकृष्ण के पास जाकर चित्ररथ की करतूत सुनाई ।
श्रीकृष्ण बोले - जो मेरे भक्त, संत, द्विज और गौ को सताता है वह मेरे दण्ड का पात्र है, यदि मैं उसे नहीं मारूं तो हस्तरहित काष्ठ की प्रतिमा में रहूँ तथा चातुर्वर्ण्य को एक पंक्ति में भोजन कराऊं ।
चित्ररथ द्रौपदी की शरण में गया । इससे कृष्ण ने उसे नहीं मारा और प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिये नीलाचलनाथ जगदीश का रूप धारण किया ।
गालब शाप देकर चित्ररथ को दण्ड दे सकते थे किन्तु तप करते समय क्रोध नहीं किया जाता, इसलिये वे श्री कृष्ण के पास गये थे ।
तापस तप करते समय, क्रोध करत है नांहि ।
कुपित हुये गालव नहीं, पीक पड़त कर मांहि ॥२४७॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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