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*साधु मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि का हेत ।*
*दादू संगति साधु की, कृपा करै तब देत ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु**भाग ३**काम*
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खण्डेला के राजा शिखादत्त के पुरोहित परशुराम की पुत्री करमैती बाई भगवान की प्रेमी भक्त थी । वह भाग कर वृन्दावन चली गई थी । उसके पिता वृन्दावन आये और उससे कहा - 'तुम्हारे छिप कर भाग आने से मेरी नाक कट गई । करमैती - 'पहले नाक थी कहां ? मुख्य नाक तो भगवत् भजन है, उसके बिना प्राणी नकटा ही होता है । आपकी आयु पचास वर्ष की हो गई है, अब भी आप भोगों में तृप्त नही होते । इस अनित्य विलासता को त्याग के अब तो भगवान में मन लगाओ ।' इत्यादि उपदेश से परशुराम का अज्ञान नष्ट हो गया और वे भजन में लग गये । इससे सूचित होता है कि हरिप्रेमी के संग से अभक्त भी भक्त बन जाते है ।
हरि प्रेमी के संग से, अभक्त बनता भक्त ।
करमैती के पिताजी, हुये ईश अनुरक्त ॥३०५॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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