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*कीया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार ।*
*क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भरतार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु**भाग १**काम*
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भंगी मल की टोकरी लेकर जा रहा था एक धनी पुरुष ने कहा - " अरे ! इसे ढक ले ।"
भंगी - मेरे पास ढकने का वस्त्र कहां है ?"
धनी ने अपना सुन्दर सुगन्धयुक्त रूमाल दिया, वह ढककर आगे चला ।
मार्ग में दो पुरुषों ने उसे पूछा - "इसमें क्या है ? हमें बता दे ।
भंगी - तुम्हारे देखने योग्य नहीं ।"
यह सुनकर एक तो वहां ही रह गया किन्तु दूसरा भंगी के पीछे हो लिया और दिखाने का आग्रह किया । भंगी ने एक गली में उसे उघाड़ कर दिखाया तब दुर्गंध के मारे वह धबराया और पछताया ।
ऐसे ही चमड़े से ढंके मल, मूत्र, रक्त, हड्डी आदि को देख कर नर-नारी परस्पर अनुरक्त होते हैं । बुद्धिमान गुरुजनों के कहने से ही समझ कर पीछे नहीं लगते और अन्य लोग अन्त में दुखी होकर पछताते हैं ।
नर तिय तन मल टोकरी, भ्रम वश हों आसक्त ।
मूर्ख प्रथम नहिं तजत हैं, त्यागें विज्ञ बिरक्त ॥२२॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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