शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग ५४/५७

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । 
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ 
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग) 
.
*॥ आन लग्न व्यभिचार ॥*
*करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक ।* 
*अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥५४॥*
एक पति वाली नारी पतिव्रता कहलाती है और नानापतिवाली व्यभिचारिणी होती है । इसी प्रकार जिसके हृदय में केवल प्रभु प्रेम है वह प्रभु का प्रेमी भक्त है । जो नाना देवताओं को भजता है वह व्यभिचारिणी स्त्री की तरह किसी का भी भक्त नहीं । प्रभुभक्त चमत्कार दिखाने वाली माया को कलंक समझता है अतः उसके पास जाता भी नहीं । देवताओं के भक्त तो ऐहिक पारलौकिक भोगों के आनंद से माया के द्वारा व्यवहार करते हुए बहुत प्रसन्न होते हैं । जैसे व्यभिचारिणी नारी प्रसन्न होती है । 
*दादू पतिव्रता के एक है, व्यभिचारिणी के दोइ ।* 
*पतिव्रता व्यभिचारिणी, मेला क्यों कर होइ ॥५५॥* 
*पतिव्रता के एक है, दूजा नांही आन ।* 
*व्यभिचारिणी के दोइ हैं, पर घर एक समान ॥५६॥* 
पतिव्रता नारी की तरह एक निज ब्रह्म स्वरूप आत्मा पति को जो भजता है । उसकी द्वैत बुद्धि नष्ट हो जाती है । अतः केवल एक ब्रह्म ही शेष रह जाता है । तेरा मेरा यह भेद भी नष्ट हो जाता है । सकाम देवताओं की भक्ति करने वाले मनुष्यों की फल विषायिणी द्वैत बुद्धि नष्ट नहीं होती । अतः दोनों प्रकार के भक्तों का कहीं भी सामानाधिकरण नहीं हो सकता । अतः अव्यभिचार से एक भगवान् को ही भजना चाहिये । गीता में- 
मुझ परमेश्वर में अनन्य योग से अर्थात भगवान् वासुदेव के अलावा मेरी दूसरी कोई गति है ही नहीं ऐसी निश्चित जो अव्यभिचारिणी बुद्धि उससे उसका भजन करना चाहिये । अर्थात् किसी प्रकार से व्यभिचार न हो उसी को अव्यभिचारिणी भक्ति कहते हैं और एकान्त और शुद्ध देश में रहना विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम न करना । 
*॥सुंदरि सुहाग॥* 
*दादू पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग ।* 
*जे जे जैसी ताहि सौं, खेलैं तिस हि रंग ॥५७॥* 
भक्त तो भगवान् के अनन्त हैं । भगवान् एक हैं । उनका कोई कर्म में, ज्ञान से ध्यान भक्ति आदि अनेक साधनों से भजते हैं । भगवान् भी उनके साथ उनकी भावना के अनुसार सगुण निर्गुण भक्ति से स्वरूपानन्द रूप दर्शन क्रीड़ा के द्वारा खेलते हैं । लिखा है कि जैसे चन्द्रमा तो एक है परन्तु उससे प्रेम करने वाले चकोर अनन्त हैं । सूर्य जैसे एक है परन्तु उसको देखने वाले नेत्र अनेक हैं । ऐसे ही भगवान् श्रीकृष्ण एक हैं उनकी उपासना करने वाले हम सब बहिन भाई बहुत हैं । गीता में भी कहा है कि- 
जो जिस भावना के अनुसार मेरी शरण में आता है फल की कामना से मैं उनको वैसा ही फल दान देकर अनुग्रहित कर देता हूं । 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें