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*सदका सिरजनहार का, केता आवै जाइ ।*
*दादू धन संचय नहीं, बैठा खुलावै खाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*शक्ति उभय गुणी का अंग १०५*
इस अंग में माया दो गुण वाली है यह विचार प्रगट कर रहे हैं ~
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माया बेड़ी बेड़ी१ माया,
हरिसिद्धि२ का भेद३ सु पाया ।
नरक नसीनी४ स्वर्ग विमान,
रज्जब रिधि५ के दोय बखान ॥१॥
माया बाँधने की बेड़ी है और तारने की नौका१ भी है, माया२ का रहस्य३ हमने जान लिया है, यह नरक की सीढी४ है और स्वर्ग का विमान भी है । इस प्रकार माया५ के दो गुण कहे जाते हैं ।
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स्वारथ परमारथ शकति, तो धिक् माया धन्न ।
रज्जब रुचे सु काढिल्यो, जो है जाके मन्न ॥२॥
माया का उपयोग स्वार्थ और परमार्थ दोनों में ही होता है । जिस मन में स्वार्थ रुचिकर हो वह माया से स्वार्थ का काम निकाल ले और जिसके मन में परमार्थ रुचिकर हो वह परमार्थ का काम निकाल ले किन्तु माया का उपयोग स्वार्थ में होता है तब तो धिक्कार और परमार्थ होता है तब धन्यवाद मिलता है ।
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परमारथ पहुपै१ मिलै, स्वारथ पड़ै अहार ।
रज्जब त्रिगुणी२ तिली में, समझ करो व्यवहार ॥३॥
माया२ को परमार्थ में लगाना तो तिलों को पुष्पों१ में पटकने के समान है । तिल पुष्पों में पड़ने से उसका तेल सुगन्धित हो जाता है, वैसे ही माया परमार्थ में लगाने से सुकीर्ति होती है । माया को स्वार्थ में लगाना तिली को भोजन में डालने के समान है । भोजन में पटके हुये तिल मल बन कर दुर्गन्ध देते हैं । वैसे ही स्वार्थ में माया का उपयोग करने से अपकीर्ति होती है, अत: समझ करके ही माया का व्यवहार करो ।
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घोड़ा थोड़ा१ कौन दिशि, चढ चौगान खिलाय ।
यूं स्वारथ परमार्थ हिं, शक्ति२ चलै सम भाय ॥४॥
घोड़े पर चढकर उसे मैदान में खिलाने से वह कौन सी दिशा में कम१ दौड़ेगा ? वह तो सब दिशाओं में समान ही दौड़ता है । वैसे ही माया२ स्वार्थ परमार्थ में समान भाव से ही चलती है ।
(क्रमशः)

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