🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
१८६ - तर्क चेतावनी । शूल ताल
मेरा मेरा काहे को कीजे रे, जे कुछ संग न आये ।
अनत करी नै धन धरीला रे, तेऊ तो रीता जावे॥टेक॥
माया बँधन अँध न चेते रे, मेर माँहिं लपटाया ।
ते जाणूं हूं यह विलासौं, अनत विरोधें खाया ॥१॥
आप स्वारथ यह विलूधा२ रे, आगम मरम न जांणें ।
जम कर माथा बाण धरीला, ते तो मन ना आंणें ॥२॥
मन विचारि सारी ते लीजे, तिल माँहीं तन पड़िबा ।
दादू रे तहं तन ताड़ीजे, जेणें मारग चढिबा ॥३॥
तर्क पूर्वक चेतावनी दे रहे हैं - जो भी सँसार में पदार्थ हैं, वे प्राणी के साथ तो कुछ आते नहीं, फिर मेरा - मेरा क्यों किया जाय ? जो अहँकार - वश अनीति करके धन संग्रह करते हैं, वे भी तो खाली हाथ ही जाते हैं ?
.
मदाँध प्राणी माया बन्धन में बँधे हुये ममता१ में लिप्त हो रहे हैं, विरोध द्वारा दूसरोँ से धन छीन कर खाते हैं और वे जानते हैं कि हम आनँद ले रहे हैं ।
.
ये लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे२ हैं किन्तु आगे इसका क्या परिणाम होगा, यह रहस्य नहीं जानते । इनके शिर पर मारने के लिए यम ने अपने हाथ में बाण धारण कर रक्खा है, उसे मन में स्मरण नहीं करते ।
.
अरे प्राणी ! यह शरीर क्षण भर में नष्ट होने वाला है, जिस मार्ग द्वारा तुझे प्रभु की ओर ऊंचे चढ़ना है, उसी में शरीर को साधन - ताड़ना दे और मन में विचार करके परब्रह्म रूप अखँड वस्तु को आत्म रूप से ग्रहण कर ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें