शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

रत्त विरक्त का अंग १०३*(२१/२५)* =

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*मीठे सौं मीठा भया, खारे सौं खारा ।*
*दादू ऐसा जीव है, यहु रंग हमारा ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi
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*रत्त विरक्त का अंग १०३*
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हंस१ अंश देही२ रले३, मिले सु माया मंड४ । 
पिंड प्राण न्यारे भये, सहज तजे ब्रह्मण्ड ॥२१॥
परमात्मा के अंश जीवन शरीर में मिलकर माया रचित ब्रह्मण्ड में रुक रहे हैं, जब ज्ञान द्वारा पिंड - प्राण से अलग हो जाते हैं तथा अनायास ही ब्रह्मण्ड को त्याग कर स्वरूप ब्रह्म में मिल जाते हैं । 
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प्राण-पिण्ड पहराईये, तब ही सकल उपाधि । 
न्यारे नारायण कला१, सहजै होय समाधि ॥२२॥
आत्मा को प्राण-पिण्ड का चोला पहनाया जाता है तभी सांसारिक सब उपाधियें होती है । प्राण-पिण्ड से अलग तो वे जीव नारायण के अंश१ है ही । इस निर्विकार स्थिति में आने पर तो अनायस ही समाप्ति हो जाती है । 
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गुड़ महुवा अरु बेर जड़, अग्नि उदक१ मिल मद्द२ । 
ये रज्जब न्यारे अमल, संगति ही सौं रद्द३ ॥२३॥
गुड़ महुवा, बेर जड़, अग्नि और जल१ इनके मिलने से ही मद्य२ बनता है, ये सभी अलग २ रहने से निर्मल हैं, मिलने पर ही मादकतारूप मल से युक्त खराब३ हो जाते हैं, वैसे ही प्राण पिंड की संगति से आत्मा विचार युक्त होता है अन्यथा निर्विकार है । 
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नर नारी का बंध दृढ, मुक्ता मदन खुलान । 
रज्जब समझे उभय घर, संकट मुक्त सुजान ॥२४॥
नर-नारी के रज-वीर्य का दृढ बंध संयमरूप जेल से काम से मुक्त होने पर दोनों के मिलन से खुल जाता है । वैसे ही प्राण पिंड के मिलने पर आत्मा का निर्वकारता रूप दृढ बंध खुल जाता है, वह विकारी हो जाता है, नर-नारी के मिलन रूप घर और आत्मा के सविकार रूप घर दोनों ही दु:खरूप है यह समझने पर बुद्धिमान दोनों से होने वाले दु:ख से मुक्त हो जाते हैं । 
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एक गया निज काम कर, एक गया बेकाम । 
रज्जब इक विमुखे वस्तु, एक सन्मुखे राम ॥२५॥
एक विरक्त अपना काम करके राम के सन्मुख जाता है और एक माया में अनुरक्त अपने कल्याण का कार्य बिना किये ही शरीर छोड़कर चौरासी में जाता है और रामरूप वस्तु से विमुख ही रहता है यही रत्त विरक्त के जीवन का अन्तिम परिणाम है । 
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित रत्त विरक्त का अंग १०३ समाप्तः ॥सा. ३२३४॥
(क्रमशः)

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