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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ३७/४०*
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रांम रांम जिन बीसरै, प्रेम प्रीति लिव२ लाइ ।
कहि जगजीवन हेत सों, सुमिर निरंतर ताहि ॥३७॥
संत कहते हैं कि हम कभी भी राम नाम को भूलें नहीं प्रेम प्रीति से तारतम्य बनायें, राम नाम की लय लगी रहे । संत कहते हैं कि प्रेम पूर्वक प्रभु का निरंतर सिमरण करें। {२. लिव-लय(=तन्मयता)}
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रांम नांम कोई दरदबंद३, नख सिख राखै मांहि ।
कहि जगजीवन प्रेम तजि, दूजा भावै नांहि ॥३८॥
संत कहते हैं कि जिसे स्मरण की चाह हो, जो स्मरण के बिना दुखी होता हो और नख शिख स्मरण में लगा हो, उसे प्रभु प्रेम के सिवा कुछ अच्छा नहीं लगता है। (३. दरदबंद-दर्दमन्द, पीड़ित{दुखी, विरही})
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रांम नांम सब खलक४ कहै, जहां तहां सब ठांम ।
कहि जगजीवन त्याग विष, रांम कहौ तहां रांम५ ॥३९॥
संत कहते हैं कि राम नाम का स्मरण सब जग करता है वे सब जगह हैं। हे जीव विष रुपी विषयों को त्याग कर यहां वहाँ सभी जगह हे भगवन, हे राम, ऐसे कहते रहें। (४. खलक-संसार) (५. रांम-हे भगवन)
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जीभ कंठ तैं काढि करि, सत खंड कीजै रांम ।
कहि जगजीवन एक छिन, जे हरि बिसरै नांम ॥४०॥
संत कहते हैं कि हे प्रभु एक क्षण की नाम विस्मृति भी एक महा अपराध है, अगर कभी यह अपराध हो तब ही जिह्वा को कण्ठ से निकाल कर सौ टुकड़े कर दें। जिह्वा की सार्थकता हरि नाम स्मरण में ही है।
(क्रमशः)

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