बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

*२. स्मरण का अंग ~ ३३/३६*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ३३/३६*
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कहि जगजीवन सबद की, रचना रची अगाध ।
नांम पिछानै नांम मंहि, नांम विचारै साध ॥३३॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि ईश्वर नाम की रचना अद्भुत है । नाम में ही प्रभु हैं और संत नाम स्मरण का ही विचार करते हैं ।
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वपु हरि सुमिरन सौं मरै१, अधर धरै मन रंग ।
नख शिख तैं विगसै तहां, जगजीवन पीव संग ॥३४॥
संत कहते हैं कि ये शरीर स्मरण करते हुये ही पूर्णता को प्राप्त हो तभी अच्छा है मन तो इसे मध्य में ही रखता है । अगर ईश्वर से स्नेह हो तो नख से शिख तक प्रभु अनुराग में रहता है वह प्रकट भी होता है । (१. वपु हरि सुमिरन सौं मरै-साधक का शरीर एवं मन पर निग्रह हरि स्मरण से ही हो सकता है)
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रोम रोम सुमिरन करूँ, तऊ न मांनै मन ।
कहि जगजीवन तेज मंहि, द्रिष्टि पडै जहां तन ॥३५॥
संत कहते हैं कि रोम रोम प्रभु स्मरण में रत हो फिर भी मन संतुष्ट न हो इससे भी अधिक करना चाहे जहाँ तक दृष्टि पड़े वहां तक प्रभु को ही देखें ।
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रांम नांम जिन बीसरै, रतन पदारथ नांम ।
कहि जगजीवन संचि धन, परम पुरिष सब ठांम ॥३६॥
संत कहते हैं ईश्वर का नाम कभी भूलें नहीं यह तो रत्न है। संत कहते हैं कि नाम स्मरण तो संचित या संग्रह किये धन के समान है वह परमात्मा सब स्थान पर विद्यमान है।
(क्रमशः)

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