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*माया मति चकचाल कर, चंचल कीये जीव ।*
*माया माते मद पिया, दादू बिसर्या पीव ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*माया का अंग १०७*
इस अंग में माया संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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रज्जब आतम राम बिच, कनक कामिनी कोट१ ।
यहु आडा अंतर२ इहै३, यहु पड़दा यहु ओट४ ॥१॥
जीवात्मा और राम के मध्य कनक-कामिनी रूप परकोटा१ है । यहां३ यही बीच२ में आडा लगा है । यही पड़दा है और यही आड४ है ।
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माया बांध्यों मन बंधै, खोल्यों खुलता जाय ।
रज्जब ग्रह१ उग्रह२ कह्या, नर देखा निरताय३ ॥२॥
माया को बांध कर रखने से मन भी उसमें बँध जाता है और उसे खोलकर परमार्थ में लगाने से मन भी उससे मुक्त हो जाता है । यह हमने ग्रहण१ लगने तथा मुक्त२ होने के समान कहा है अर्थात ग्रहण१ लगने से प्रकाश रुक जाता है और मुक्त२ होने से प्रकाश खुल जाता है, वैसे ही उक्त माया-मन का संबन्ध है । हे नरों ! तुम भी विचार३ करके देख सकते हो, यह कथन उचित ही ज्ञान होगा ।
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ब्रह्माण्ड छिप्या फूल हु तले, केतक१ बड़े सु जोय ।
त्यों लघु माया दीर्ध ब्रह्म, पर जीव सु आडी होय ॥३॥
नेत्र का फूला और फूल दोनों कितनेक१ बड़े हैं ? छोटे तो हैं, तो भी दृष्टि के आडे आने पर विशाल ब्रह्माण्ड को छिपा देते हैं, वैसे ही माया छोटी सी है और ब्रह्म बड़ा है किन्तु जीव की ज्ञान-दृष्टि के आडे आ जाती है, तब ब्रह्म नहीं भासता ।
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मन माया सौं बंधि करि, निश्चल कदे न होय ।
रज्जब पिंडा चाक पर, अस्थिर१ सुन्या न कोय ॥४॥
जैसे कुम्हार के चाक पर स्थित मिट्टी का पिंडा घूमते हुये चाक पर घूमता ही है, निश्चल रहता हुआ किसी से भी नहीं सुना, वैसे ही चंचल माया का आसक्ति से बंधा हुआ मन भी कभी निश्चल१ नहीं हो सकता ।
(क्रमशः)

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