बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

*२. स्मरण का अंग ~ २१/२४*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ २१/२४*
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प्रेम विलास अगाध गति, निहचल मन मोहि नांम ।
नख सिख निरमल ऊजला, जगजीवन रमि रांम ॥२१॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि जो जन प्रभु प्रेम में गहराई तक पहुंचे हैं उनकी गति सहज ही नहीं समझी जा सकती भगवन्नाम ही उनका मन मोहता है । संत कहते हैं कि उन जन का नख शिख निर्मल होता है कोइ विकार नहीं होता वे राम में ही रमे रहते हैं ।
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सुमिरन सेवा बंदगी, दासातन७ जे होइ ।
जगजीवन इस जीव कूं, दुक्ख न व्यापै कोइ ॥२२॥
संत कहते हैं कि जो जन प्रभु सेवा वन्दन करते हुये दासभाव से रहते हैं उन्हें कोइ दुःख नहीं व्यापता है । (७. दासातन-दासता{दास्यभक्ति})
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सुमिरन सांची बंदगी, सुमिरन सेवा नांम ।
सुमिरन दासातन हृदै, जगजीवन भजि रांम ॥२३॥
संत कहते हैं कि प्रभु स्मरण ही सच्ची बंदगी है, स्मरण ही सेवा है और जिनके हृदय में दास भाव है वे ही राम भजते हैं ।
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सुमिरन रूप१ सरीर को, सुमिरन सकल सिंगार ।
सुमिरन सोभा नूर हरि, जगजीवन निज सार ॥२४॥
संत कहते हैं कि स्मरण ही सत्य स्वरूप है । स्मरण ही सिंगार है स्मरण ही सच्चा सौन्दर्य है, तेज है, और यही जीवन का सार है ।
(क्रमशः)

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