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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१८९ - कलियुगी । त्रिताल
झूठा कलिजुग कह्या न जाइ,
अमृत को विष कहैं बनाइ ॥टेक॥
धन को निर्धन, निर्धन को धन,
नीति अनीति पुकारै ।
निर्मल मैला, मैला निर्मल,
साधु चोर कर मारै ॥१॥
कंचन काच, काच को कंचन,
हीरा कंकर भाखै१ ।
माणिक मणियाँ, मणियाँ माणिक,
साच झूठ कर नाखै ॥२॥
पारस पत्थर, पत्थर पारस,
कामधेनु पशु भावै ।
चँदन काठ, काठ को चँदन,
ऐसी बहुत बनावै ॥३॥
रस को अणरस, अणरस को रस,
मीठा खारा होई ।
दादू कलिजुग ऐसा बरतै,
सांचा विरला कोई ॥४॥
कलियुगी प्राणियों का परिचय दे रहे हैं - यह कलियुग का समय इतना झूठा है कि पूर्णरूप से तो कहा भी नहीं जाता । कलियुगी प्राणी अमृत रूप वाणी को भी उसमें मिथ्या मिला, विष बना कर कहते हैं ।
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राम - धन युक्त को निर्धन, राम - धन रहित पदार्थों को धन, भक्तियुक्त उत्तम नीति को अनीति, भजन द्वारा निर्मल को जाति दोष लगाकर मैला, दुर्गुणों से मलीन को जाति द्वारा निर्मल कहते हैं । साधु को चोर कहकर मारते हैं ।
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कंचन समान श्रेष्ठौं को तो कांच के समान और केवल वस्त्र भूषणादि की चमक युक्त कांच के सदृश्यों को कंचन के समान श्रेष्ठ और हरि नाम हीरा को कंकर के समान कहते१ हैं । माणिक्य समान श्रेष्ठ विचारशीलों को काष्ठ - मणियोँ के समान, उत्तम - विचार हीन स्वार्थ सिद्धि के लिए मधुर बोल ने वालों को माणिक्य के समान श्रेष्ठ कहते हैं और सत्य को मिथ्या कहकर त्याग देते हैं ।
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सद्गुरु रूप पारस को साधारण नर रूप पत्थर, साधारण नर रूप पत्थर को ज्ञान की बातों द्वारा सद्गुरु रूप पारस और कामधेनु को पशु कहते हैं । सँत रूप चँदन को सामान्य मनुष्य रूप काष्ठ और सामान्य मनुष्य रूप काष्ठ को सुन्दर बातों द्वारा सँत रूप चँदन कहते हैं ।
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राम - भजन रस को अनरस और हास्यादि को रस, अति मधुर ब्रह्म - विचार को खारा और कटु विषयों को मधुर कहते हैं । अन्य भी ऐसी ही बहुत - सी बातें बनाते हैं । इसी प्रकार कलियुग में बर्ताव करते हैं । सच्चा मानव कलियुग में कोई विरला ही होता है ।
(क्रमशः)

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