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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर कुछ नांहि ।*
*ज्यों पाला पाणी कों मिल्या, त्यों हरिजन हरि मांहि ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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सुमति कुमति का अंग १०४
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इन्द्रिय आभे१ ऊनवन२, तब लग खिवणि३ खिवाहिं४ ।
समझ५ शून्य६ सुत के फिरे, मनसा बीज७ बिलाहिं ॥९॥
बादल१ घिरे२ रहते हैं तब तक ही बिजली३ चमकती४ है और आकाश६ के पुत्र बादल आकाश में लय हो जाते हैं तब बिजली७ भी लय हो जाती है, नहीं चमकती, वैसे ही इन्द्रियाँ विषयों पर मँडराई हुई रहती हैं जब तक विषयाशा उठती है और ब्रह्म ज्ञान५ के उदय होने पर इन्द्रियाँ विषयों से लौटकर ब्रह्म परायण हो जाती हैं तब विषयाशा भी नष्ट हो जाती है ।
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आतम अंभ१ अकार में, तब लग नीचे जाँहिं ।
जन रज्जब तन त्यागते, उभय अकाश समांहिं ॥१०॥
जल१ तब तक ही नीचे जाता है जब तक आकारवान है, जब आकार को त्यागकर भाप बन जाता है तब आकाश में समा जाता है । वैसे ही आत्मा आकार में स्थित है तब तक ही नीचे जाता है जब शरीर को त्याग देगा तब ब्रह्म में समा जायगा ।
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अनल अंड अज्ञान गति१, जब लग नीचे जाँहिं ।
रज्जब पाये ज्ञान पर२, उलटे शून्य३ समांहि ॥११॥
अनल पक्षी का अंडा जब तक पंख नहीं आते तब तक ही नीचे जाता१ है पंख२ आते ही उलटा आकाश३ को चला जाता है । वैसे ही प्राणी में अज्ञान है तब तक नीचे को जाता है ज्ञान होने पर वह भी ब्रह्म३ में समा जाता है ।
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अंडा अवनि न छाड़ ही, बिना पंख परकास१ ।
रज्जब रहसी रज पड्या, गम२ नहिं गगन३ निवास ॥१२॥
अंडा पंख प्रकट१ हुये बिना पृथ्वी को नहीं छोड़ता धुलि में ही पड़ा रहेगा, उसमें आकाश३ में पहुंचने२ की शक्ति नहीं होती । वैसे ही ब्रह्म ज्ञान बिना जीव का ब्रह्म में निवास नहीं हो सकता, संसार में ही रहेगा ।
(क्रमशः)

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