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*दादू भोजन दीजे देह को, लिया मन विश्राम ।*
*साधु के मुख मेलिये, पाया आतमराम ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२५. नवद्वीप में ईश्वरपुरी*
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येषां संस्मरणात्पुंसां सद्यः शुद्ध्यन्ति वै गृहाः।
किं पुनर्दर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभिः॥[१]
([१] जिस(विरक्त महात्माओं)-के भक्तिभाव से स्मरण कर लेने मात्र ही से गृहस्थियों के गृह पवित्र हो जाते हैं, वे महात्मा यदि किसी के घर पर आ जायँ और उस बड़भागी को उनके दर्शन, पादस्पर्श, पादप्रक्षालन और आसन आदि द्वारा सेवा करने का सुयोग प्राप्त हो जाये तो फिर उसके भाग्य का तो कहना ही क्या है? श्रीमद्भा. 1/19/33)
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बड़े-बड़े विद्वान और धर्मकोविदों ने गृहस्थ-धर्म की जो इतनी भारी प्रशंसा की है, उसका एक प्रधान कारण है अतिथि-सेवा। गृहस्थ में रहकर मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार अतिथि-सेवा भलीभाँति कर सकता है। भूखे को यथासामर्थ्य भोजन देना, प्यासे को जल पिलाना और निराश्रित को आश्रय प्रदान करके सुख पहुँचाना- इनसे बढ़कर कोई दूसरा धर्म हो ही नहीं सकता।
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अहा ! उस बड़भागी गृहस्थ के घर की कल्पना तो कीजिये। छोटा-सा लिपा-पुता स्वच्छा घर है, एक ओर तुलसी का बिरवा आँगन में शोभा दे रहा है, दूसरी ओर हल्दी और कुंकुम से पूजित सुन्दर-सी श्यामा गौ बँधी है। गृहिणी सुन्दर और हँसमुख है, छोटे-छोटे बच्चे आँगन में खेल रहे हैं। गृहिणी मुख से सुन्दर हरि नाम का उच्चारण करती हुई रसोई बना रही है, इतने ही में गृहपति आ गये।
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भोजन तैयार है, गृहपति ने गोग्रास निकाला, सभी सामग्रियों में से थोड़ा-थोड़ा लेकर अग्नि में आहुत दी और द्वार पर खडे़ होकर किसी अतिथि की खोज करने लगे। इतने ही में क्या देखते हैं, एक विरक्त महात्मा कौपीन लगाये भिक्षा के निमित्त ग्राम की ओर आ रहे हैं।
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गृहस्थी ने आगे बढ़कर महात्मा के चरणों में अभिवादन किया और उनसे भिक्षा कर लेने की प्रार्थना की। सद्गृहस्थी की प्रार्थना स्वीकार करके संत उसके घर में जाते हैं। योग्य अतिथि को देखकर दम्पती हर्ष से उन्मत्त-से हो जाते हैं। अपने सगे जमाई की तरह उनका स्वागत-सत्कार करते हैं।
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महात्मा के चरणों को धोकर उस जल का स्वयं पान करते हैं और अपने घर भर को पवित्र बनाते हैं। संत को बड़ी ही श्रद्धा से अपने घर में जो भी कुछ रूखा-सूखा बना है, प्रेम से खिलाते हैं। भोजन करके महात्मा चले जाते हैं और गृहस्थी अपने बाल-बच्चे और आश्रित जनों के साथ उस शेष अन्न को पाता है। ऐसे गृहस्थधर्म से बढ़कर दूसरा कौन-सा धर्म हो सकता है? ऐसा गृहस्थी स्वयं तो पावन बन ही जाता है किन्तु जो लोग अतिथि होकर ऐसे गृहस्थ का आतिथ्य स्वीकार कर लेते हैं वे भी पवित्र हो जाते हैं।
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ऐसे अन्न के दाता, भोक्ता दोनों ही पुण्य के भागी होते हैं। निमाई पण्डित को हम आदर्श सद्गृहस्थी कह सकते हैं। उनकी वृद्धा माता प्रेम की मानो मूर्ति ही हैं, घर में जो भी आता है उसको पुत्र की भाँति प्यार करती हैं और उससे भोजनादि के लिये आग्रह करती हैं। लक्ष्मीदेवी का स्वभाव बड़ा ही कोमल है, वे दिनभर घर का काम करती हैं ओर तनिक भी दुःखी नहीं होतीं।
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निमाई तो रसिकशिरोमणि हैं ही, वे दो-एक के साथ बिना भोजन करते ही नहीं, लक्ष्मी देवी सबके लिये आलस्यरहित होकर रन्धन करती हैं और अपने पति के साथ उनके प्रेमियों को भी उसी श्रद्धा के साथ भोजन कराती हैं। कभी-कभी घर में दस-दस, पाँच-पाँच अतिथि आ जाते हैं। वृद्धा माता को उनके भोजन की चिन्ता होती है, निमाई इधर-उधर से क्षणभर में सामान ले आते हैं और उसके द्वारा अतिथि-सेवा की जाती है।
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नगर में कोई भी नया साधु-वैष्णव आवे यदि उसके साथ निमाई का साक्षत्कार हुआ तो वे उसे भोजन के लिये नवद्वीप में ईश्वरपुरी जरूर निमन्त्रित करेंगे और अपने घर ले जाकर भिक्षा करावेंगे। ये सब कार्य ही तो उनकी महानता के द्योतक हैं।
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पाठक श्री मन्माधवेन्द्रपुरी जी के नाम से तो परिचित ही होंगे और यह भी स्मरण होगा कि उनके अन्तरंग और सर्वप्रिय शिष्य श्रीईश्वरपुरीजी थे। भक्तशिरोमणि श्रीमाधवेन्द्रपुरी इस असार संसार को त्याग कर अपने नित्यधाम को चले गये- अन्तिम समय में उनके रूँधे हुए कण्ठ से यह श्लोक निकला था-
अति ! दीनदयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे।
हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम्॥
अर्थात ‘हे दीनों पर दया करने वाले मेरे नाथ ! व्रजेशनन्दन ! इन चिरकाल की पियासी आँखों से आपकी अमृतोपम मकरन्दमाधुरी का कब पान कर सकूँगा। हे नाथ ! यह हृदय तुम्हारे दर्शन के लिये कातर हुआ चारों ओर बड़ी ही द्रुतगति से दौड़ रहा है। हे चंचल श्याम ! मैं क्या करूँ?’
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यह कहते-कहते उन्होंने इस पांच भौतिक शरीर का त्याग कर दिया। अन्तिम समय में वे अपना सम्पूर्ण प्रेम श्रीईश्वरपुरी को अर्पण कर गये।
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गुरुदेव से अमूल्य प्रेमनिधि पाकर ईश्वरपुरी तीर्थों में भ्रमण करते हुए गौड़ देश की ओर आये। इनका जन्मस्थान इसी जिले के कुमारहट्ट नामक ग्राम में था। ये जाति के कायस्थ थे, कोई-कोई इन्हें वैद्य भी बताते हैं, किन्तु वैष्णवों की जाति ही क्या? उनकी तो हरिजन ही जाति है, फिर संन्यास धारण करने पर तो जाति रहती ही नहीं।
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ये सदा श्रीकृष्ण प्रेम में उन्मत्त-से बने रहते थे। जिह्व से सदा मधुर श्रीकृष्ण नाम उच्चारण करते रहते और प्रेम में छके-से, उन्मत्त-से, अलक्षितरूप से देश में भ्रमण करते हुए भाग्यवानों को अपने शुभ दर्शनों से पावन बनाते फिरते थे, इसी प्रकार भ्रमण करते हुए ये नवद्वीप में भी आये और अद्वैत आचार्य के घर के समीप आकर बैठ गये।
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आचार्य देखते ही समझ गये, ये कोई परम भागवत वैष्णव हैं, उन्होंने इनका यथोचित सत्कार किया। परिचय प्राप्त होने पर तो आचार्य के आनन्द का ठिकाना ही न रहा। उने गुरुदेव के प्रधान और परम प्रिय शिष्य उनके गुरुतुल्य ही थे।
(क्रमशः)

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