बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

*२५. नवद्वीप में ईश्वरपुरी*

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*साधु सपीड़ा मन करै, सतगुरु शब्द सुनाइ ।*
*मीरां मेरा मिहर कर, अन्तर विरह उपाइ ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२५. नवद्वीप में ईश्वरपुरी*
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श्री अद्वैताचार्य ने श्रीईश्वरपुरी जी की गुरुवत पूजा की और कुछ काल नवद्वीप में ही रहने का आग्रह किया। पुरी महाशय ने आचार्य की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वहीं उनके पास रहकर श्रीकृष्ण कथा और सत्संग करने लगे।
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नवद्वीप में रहते हुए महामहिम श्रीईश्वरपुरी ने निमाई पण्डित का नाम तो सुना था, किन्तु साथ ही यह भी सुना था कि वे बड़े भारी चंचल हैं, वैष्णवों से खूब तर्क-वितर्क करते हैं। इसलिये पुरी महाशय ने भेंट नहीं की। एक दिन अकस्मात निमाई की ईश्वरपुरीजी से भेंट हो गयी। संन्यासी समझकर निमाई पण्डित ने पुरी महाशय को प्रणाम किया। परिचय पाकर उन्हें परम प्रसन्नता हुई।
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पुरी महाशय तो उनके रूप-लावण्य को देखकर मन्त्र मुग्ध की भाँति एकटक दृष्टि से उनकी ही ओर देखते रहे। उन्होंने सिर से पैर तक निमाई को देखा, फिर देखा और फिर देखा। इस प्रकार बार-बार उनके अद्भुत रूप-लावण्य और तेज को देखते, किन्तु उनकी तृप्ति ही नहीं होती थी। वे सोचने लगे ये तो कोई योगभ्रष्ट महापुरुष- से जान पड़ते हैं, इनके चेहरे पर कितना तेज है, हृदय की स्वच्छता, शुद्धता और प्राणिमात्र के प्रति ममता इनके चेहरे से प्रस्फुटित हो रही है। ये साधारण पुरुष कभी हो ही नहीं सकते। जरूर कोई प्रच्छन्न वेशधारी महापुरुष हैं।
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पुरी को एकटक अपनी ओर देखते देखकर हँसते हुए निमाई बोले- ‘पुरी महाशय ! अब इस प्रकार कहाँ तक देखियेगा। आज हमारे ही घर भिक्षा कीजियेगा, वहाँ दिन भर हमें देखते रहने का सुअवसर प्राप्त होगा।’ यह सुनकर पुरी महाशय कुछ लज्जित-से हुए और उन्होंने निमाई का निमन्त्रण बड़े प्रेम से स्वीकार कर लिया।
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भोजन तैयार होने के पूर्व निमाई अद्वैताचार्य के घर से पुरी को लिवा ले गये। शची माता ने स्वामी जी की बहुत ही अधिक अभ्यर्चना की और उन्हें श्रद्धा-भक्ति के साथ भोजन कराया। भोजन के अनन्तर कुछ काल तक दोनों महापुरुषों में कुछ सत्संग होता रहा, फिर दोनों ही अद्वैताचार्य के आश्रम में आये। अब तो निमाई पण्डित पुरी महाशय के समीप यदा-कदा आने लगे।
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उन दिनों पुरी महाशय ‘श्रीकृष्णलीलामृत’ नामक एक ग्रन्थ की रचना कर रहे थे। पुरी ने पण्डित समझकर इनसे उस ग्रन्थ के सुनने का आग्रह किया। गदाधर पण्डित के साथ सन्ध्या समय जाकर ये उस ग्रन्थ को रोज सुनने लगे। पुरी महाशय ने कहा- ‘आप पण्डित हैं, इस ग्रन्थ में जहाँ भी कहीं अशुद्धि हो, त्रुटि मालूम पड़े, वहीं आप बता दीजियेगा।’ इन्होंने नम्रता के साथ उत्तर दिया- ‘श्रीकृष्ण-कथा में भला क्या शुद्धि और क्या अशुद्धि।
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भक्त अपने भक्ति-भाव के आवेश में आकर जो भी कुछ लिखता है, वह परम शुद्ध ही होता है। जिस पद में भगवत-भक्ति है, जिस छन्द में श्रीकृष्ण-लीला का वर्णन है वह अशुद्ध होने पर भी शुद्ध है और जो काव्य श्रीकृष्ण-कथा से रहित है वह चाहे कितना भी ऊँचा काव्य क्यों न हो, उसकी भाषा चाहे कितनी बढि़या क्यों न हो, वह व्यर्थ ही है। भगवान तो भावग्राही हैं, वे घट-घट की बातें जातने हैं। बेचारी भाषा उनकी विरदावली का बखान कर ही क्या सकती है, उनकी प्रसन्नता में तो शुद्ध भावना ही मुख्य कारण है।
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यथा-
मूर्खो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे।
उभयोस्तु शुभं पुण्यं भावग्राही जनार्दनः॥
अर्थात मूर्ख कहता है ‘विष्णाय नमः’ [१] और विद्वान कहते हैं ‘विष्णवे नमः’ परिणाम में इन दोनों का फल समान ही है। क्योंकि भगवान जनार्दन तो भावग्राही हैं। उनसे यह बात छिपी नहीं रहती कि ‘विष्णाय’ कहने से भी उसका भाव मुझे नमस्कार करने का ही था।’
([१] यथार्थ में ‘विष्णु’ शब्द का चतुर्थी में ‘विष्णवे’ बनता है, मूर्ख ‘रामाय’ और ‘गणेशाय’ की तरह अनुमान से ‘विष्णाय’ लगाकर ही भगवान् को नमस्कार करते)
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निमाई पण्डित का ऐसा उत्तर सुनकर पुरी महाशय अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘यह उत्तर तो आपकी महत्ता का द्योतक है। इस कथन से आपने श्रीकृष्ण-लीला की महिमा का ही वर्णन किया है। आप धुरन्धर वैयाकरण हैं, इसलिये पद-पदान्त और क्रिया की शुद्धि-अशुद्धि पर आप ध्यान जरूर देते जायँ।’ यह कहकर वे अपने ग्रन्थ को इन्हें सुनाने लगे। ये बड़े मनोयोग के साथ नित्यप्रति आकर उस ग्रन्थ को सुनते और सुनकर प्रसन्नता प्रकट करते।

एक दिन ग्रन्थ सुनते-सुनते एक धातु के सम्बन्ध में इन्होंने कहा- ‘यह धातु ‘आत्मनेपदी’ नहीं है ‘परस्मैपदी’ है।’ पुरी उसे आत्मनेपदी ही समझे बैठे थे। इनकी बात से उन्हें शंका हो गयी। इनके चले जाने के पश्चात् पुरी रात भर उस धातु के ही सम्बन्ध में सोचते रहे। दूसरे दिन जब ये फिर पुस्तक सुनने आये तो इनसे पुरी ने कहा- ‘आप जिसे परस्मैपदी धातु बताते थे, वह तो आत्मनेपदी ही है।’ यह कहकर उन्होंने उस धातु को सिद्ध करके इन्हें बताया।
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सुनकर ये प्रसन्न हुए और कहने लगे- ‘आप ही का कथन ठीक है, मुझे भ्रम हो गया होगा।’ इस प्रकार इन्होंने पुरी के समस्त ग्रन्थ को श्रवण किया। उस ग्रन्थ के श्रवण करने से इन्हें बहुत ही सुख प्राप्त हुआ। इनकी श्रीकृष्णभक्ति धीरे-धीरे प्रस्फुटित-सी होने लगी। ईश्वरपुरी के प्रति भी इनका आन्तरिक अनुराग उत्पन्न हो गया। कुछ काल के अनन्तर पुरी महाशय नवद्वीप से गया की ओर चले गये और निमाई पूर्व की भाँति अपनी पाठशाला में पढ़ाने लगे।
(क्रमशः)

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