बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

= १९० =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
१९० - भगवन्त भरोसा । ललित ताल
दादू मोहि भरोसा मोटा१ ।
तारण तिरण सोई संग मेरे, 
कहा करै कलि खोटा ॥टेक॥
दौं१ लागी दरिया तैं न्यारी, 
दरिया मँझ न जाई ।
मच्छ कच्छ रहें जल जेते, 
तिन को काल न खाई ॥१॥
जब सूवे पिंजर घर पाया, 
बाज रह्या बन माँहीं ।
जिनका समर्थ राखणहारा, 
तिनको को डर नाँहीं ॥२॥
साचै झूठ न पूजै कबहूं, 
सत्य न लागै काई ।
दादू साचा सहज समाना, 
फिर वै झूठ विलाई ॥३॥
भगवद् भरोसा दिखा रहे हैं - मुझको भगवान् का ही महान्१ भरोसा है, भक्तों को सँसार से तारने वाले और स्वयँ सब विकारों से तिरे हुये प्रभु मेरे साथ हैं । अत: खोटा कलियुग मेरा क्या कर सकता है ? 
.
जैसे समुद्र वो नदी से बाहर वन में अग्नि१ लगी हो, वह समुद्र वो नदी में नहीं जाती और उनके जल में रहने वाले मत्स्य, कच्छपादि को वह अग्नि रूप काल नहीं मार सकता 
.
और जैसे शुक पक्षी को घर तथा पिंजरा प्राप्त हो जाता है, तब उसका शत्रु बाज पक्षी वन में ही रह जाता है, घर आकर पिंजरे में स्थित शुक पक्षी को नहीं मार सकता । वैसे ही जिन भक्तों का रक्षक समर्थ परमात्मा है, उनको कलियुग और कालादि का कुछ भी भय नहीं होता । 
.
सच्चे की समता झूठा कभी नहीं कर सकता । सत्य को किसी प्रकार का दोष नहीं लगता । सच्चा भक्त तो सहज स्वरूप परब्रह्म में समाता है और झूठा पुन: सँसार में ही विलीन होता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें