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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग)
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*॥ मन हरि भाँवरि॥*
*साहिब जी का भावता, कोई करै कलि मांहि ।*
*मनसा वाचा कर्मना, दादू घटि घटि नांहि ॥३२॥*
इस कलिकाल में जैसे पतिव्रता नारी दुर्लभ है वैसे ही पूर्वोक्त साधनों से मन वाणी कर्म से प्रभु भक्ति को करने वाले कोई-कोई ही भक्त होते हैं । भागवत् में लिखा है कि-
हे पुत्रों ! यह मनुष्य चतुर होकर भी जब इन्द्रियों को प्रसन्न करने के लिये परिश्रम करता है तब निःसंदेह मतवाला होकर पाप कर्म करने लगता है । एकबार के पाप कर्म को करने जब यह आत्मा को दुःख देने वाला देह उत्पन्न हो जाता है तब भला फिर उस विरुद्ध कर्म को बारंबार करना अच्छा नहीं है । हम तो इसको अच्छा नहीं मानते हैं । पुरुष जब तक आत्मतत्त्व को जानने की चेष्टा नहीं करता तभी तक उसके निकट अज्ञानता से स्व, पर का तिरस्कार होता है । क्योंकि जब तक क्रिया रहती है तब तक मन कर्मों में लगा रहता है और यह कर्म स्वभाव ही शरीर के बन्धन का कारण है । अतः पहले किया हुआ कर्म ही मन को कर्मों में लगाता है । जब तक अविद्या उपाधि से युक्त आत्मस्वरूप जो मैं वासुदेव हूँ, मुझ में प्रीति नहीं करता । तब तक देह के सम्बन्ध से जीव नहीं छूटता । अतः कर्म बन्धन से छूटने के लिये भक्ति करो ।
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*॥ पतिव्रता निष्काम॥*
*आज्ञा मांहैं बैसै ऊठै, आज्ञा आवै जाइ ।*
*आज्ञा मांहैं लेवै देवै, आज्ञा पहरै खाइ ॥३३॥*
*आज्ञा मांही बाहर भीतर, आज्ञा रहै समाइ ।*
*आज्ञा मांही तन मन राखै, दादू रहै ल्यौ लाइ ॥३४॥*
जैसे पतिव्रता नारी अपने स्वामी की आज्ञा से ही अपने शरीर का कार्य तथा घर का कार्य करती है । ऐसे ही प्रभु भक्त भी प्रभु की आज्ञा से सब कर्म करता है । यह आज्ञापालनरूप कर्म बड़ा ही दुष्कर है । महाभारत में लिखा है कि-
अपने मन और इन्द्रियों को रोक कर पति को देवता की तरह मानती हुई स्त्री पति की सेवा करे । यह स्त्रियों का धर्म बड़ा ही दुष्कर है । ऐसे ही भगवान् की आज्ञा का पालन करना भी बड़ा ही दुष्कर है और माता-पिता की सेवा करना भी कठिन है ।
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*पतिव्रता गृह आपने, करै खसम की सेव ।*
*ज्यों राखै त्यों ही रहै, आज्ञाकारी टेव ॥३५॥*
जैसे पतिव्रता भार्या घर में रहती हुई पति की आज्ञा के अनुसार उसकी सेवा करती है । उसी प्रकार भगवान् का भक्त भी प्रभु सेवा में अनुरक्त होकर प्रारब्धानुसार सुख-दुःख को भोगता हुआ प्रभु की सेवा करता है, और दुःख नहीं मानता किन्तु सेवा से प्रसन्न होता है कि मैं प्रभु को कितना प्यारा हूँ कि जिससे भगवान् मझे ही आज्ञा देते हैं ।
(क्रमशः)

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